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तोहरे दुआरे मात, खड़े दोउ कर जोरे,

अब तो आप आइके, दरस दिखाइए |

तोहरी शरण आया, तेरा ये कपूत मात,

सेवक को मां अपनी, शरण लगाइए |

इक आस तोरी मात, दूजा को सहाई मोर,

अइसे न आप मोरी, सुधि बिसराइए |

बिपत जो आन पड़ी तुझको पुकारूं मातु,

आप ही अब आइके, पार मा लगाइए |

 

                              - बृजेश नीरज

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Comment by बृजेश नीरज on April 18, 2013 at 5:08pm

राम भाई आपका आभार!

Comment by ram shiromani pathak on April 18, 2013 at 5:01pm

आदरणीय बृजेश जी,बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने /// हार्दिक बधाई

Comment by बृजेश नीरज on April 18, 2013 at 11:00am

केवल जी आपका आभार! मां दुर्गे आप पर अपना आशीष बनाए रखें।

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 18, 2013 at 10:04am

आदरणीय,बृजेश कुमार सिंह जी, सुप्रभात व सादर प्रणाम! अतिसुन्दर। माता सदा सहाय रहें, जय माता की!!! हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

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