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होली गीत / मंजरी पाण्डेय

   

रंग गई रंग गई हे री सखी
मैं तो फाग के रंग में रंग गई।

1 - रंग ना गुलाल मै तो शर्म से लाल हुई

पिया घर आये मै आप गुलाल हुई

छेड़ो न छेड़ो न हे

मोहे छेड़ो न छेड़ो न छेड़ो सखी

मै तो अपने पिया रंग रंग गई।

रंग गई .........................

2 - धानी चुनर सरक सरक जाय रही

कान्हे से माथे की दौड़ लगाय रही

पकड़ो न पकड़ो न हे

अरे पकड़ो न पकड़ो न हे री सखी

मैं अपने पिया संग हो ली।

रंग गई .......................

3 - आम बावुर गए कोयल मगन हुई

नस नस में पिय की सुगंधि गमक गई

रोको न रोको न हे

रोको न रोको न " मन्जरी " को

तितली बन कंत के संग चली

रंग गई .................

 

 

 

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Comment by Dr.Ajay Khare on March 12, 2013 at 11:05am

pandey mam sunder srigarik holi geet ke liye dher sari bdhai

Comment by Savitri Rathore on March 11, 2013 at 5:22pm

पिया के प्रेम का अत्यंत सुन्दर चित्रण।बधाई हो मंजरी जी।

Comment by ram shiromani pathak on March 11, 2013 at 4:22pm

आदरणीया बहोत ही बढ़िया चित्रण किया है अपने .......... हार्दिक बधाई. .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 11, 2013 at 1:38pm

होली के माहौल की उन्मुक्तता से भरे इस गीत के लिए हार्दिक बधाई. .

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