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बस तेरी चुप्पी मुझे खलने लगी

जब से मजबूरी मेरी बढ़ने लगी

दोस्तों से दूरी भी बनने लगी

 

उनकी हाँ में हाँ मिलाया जब नहीं 

बस मेरी मौजूदगी डसने लगी

 

कद मेरा उस वक्त से बढ़ने लगा

आजमाइस दुनिया जब करने लगी

 

भा गई फिर सब्र की तौफीक भी 

ज़ुल्म की शिद्दत भी जब बढ़ने लगी

 

दूर मुझसे आप जब से हो गए

ज़िंदगी से हर खुशी झड़ने लगी

 

तेरी हर तकलीफ से वाकिफ़ हूँ मै

बस तेरी चुप्पी मुझे खलने लगी 

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Comment

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Comment by Dr.Ajay Khare on February 19, 2013 at 12:05pm

khan sahib bahut hi badia khyaal hai badhai

Comment by विजय मिश्र on February 19, 2013 at 11:49am

नादिर साहब ! गुमसुम सी चल रही आज के दौर के इंसान की गुमसती हुई जिंदगी को बखूबी उभारा है आपने अपने लफ्जों में . बेहतरीन, शायद आज की ग़ज़ल का मौजूँ ऐसा ही होना चाहिए .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 19, 2013 at 11:20am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है आ. नादिर जी

शुभकामनाएं  

Comment by vijay nikore on February 19, 2013 at 9:07am

बहुत लाजवाब शेर हैं।

बधाई।

विजय निकोर

Comment by नादिर ख़ान on February 19, 2013 at 8:16am

अदरणीय सौरभ जी, अदरणीय  वीनस जी आप दोनों का बहुत आभार हमेशा आप लोगों से सीखने को मिलता है, ये सौभाग्य की बात है। बहुत जल्दी गज़ल में सुधार की कोशिश करेंगे ।मार्गदर्शन के लिए बहुत आभारी हूँ ।

Comment by नादिर ख़ान on February 19, 2013 at 8:11am

 बृजेश जी ,आशीष जी ,वेदिका जी आप लोगों ने रचना को सराहा बहुत-बहुत शुक्रिया,लिखने के लिए फिर हौंसला मिला ।

Comment by वीनस केसरी on February 19, 2013 at 1:46am

मतला से आख़िरी शेअर तक बेहतरीन ग़ज़ल हुई है ...

कई शेअर शानदार हैं

तेरी हर तकलीफ से वाकिफ़ हूँ मै

बस तेरी चुप्पी मुझे खलने लगी

आख़िरी शेअर के लिए दिली मुबारकबाद 

छोड़ा २२  को छुटा १२ करने का विकल्प मौजूद है बस भाव में हल्की सी तबदीली आयेगी ...
चौथे शेअर में मिसरा उला में भी रदीफ़ निभ गई है उस पर भी नज़ारे सानी फरमाएँ तो ग़ज़ल और निखरेगी ...
शुभकामनाएं

Comment by वेदिका on February 19, 2013 at 12:40am

वाह वाह !

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 18, 2013 at 11:56pm

वाह वाह !!!  यह शेर तो लाजवाब है.......

तेरी हर तकलीफ से वाकिफ़ हूँ मै

बस तेरी चुप्पी मुझे खलने लगी |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 18, 2013 at 11:55pm

नादिर साहिब , आपकी कोशिश अच्छी लगी. 

उनकी हाँ में हाँ मिलाना क्या छोड़ा

बस मेरी मौजूदगी डसने लगी

इस शेर के लिए बार-बार बधाई कह रहा हूँ. बहुत सुधरी बात कही है आपने.

वैसे भाई छोड़ा  के छो को गिराना उचित नहीं लगा है.

आपके कहे का हमेशा इंतज़ार रहता है.

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