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कविता - तख्तियां !

टूटा दूर दिल्ली के क्षितिज पर 
एक खूबसूरत तारा 
सबने मन्नतें मांगी 
कुछ टूटने से दुखी हुए 
हम भी 
कुछ ने शीशे सी चमकती सडको पर 
अट्टालिकाओं के साए में 
जुलूस निकाले 
मोमबत्तियां जलाईं 
असरदार नारों की तख्तियां लहरायीं 
चैनलो पर प्राइम टाइम में 
सुनी और देखी गयीं उनकी चिल्लाहटें 
प्रायोजनों के साथ 
संसद तक में टपक पड़े आंसू 
और दूर एक छोटे शहर के 
छोटे से मोहल्ले के 
छोटे अँधेरे कमरे में 
सिसकती साँसों का दम
दीवार के बाहर तक रहा अनसुना 
कहीं कोई खबर नहीं छपी 
हमारे स्पंदन में नहीं आया कोई बदलाव 
संसद क्या नुक्कड़ पर भी ये नहीं बना 
चर्चा का विषय 
घर में ही गुमसुम सा रहा ये मुद्दा 
हो गया ख़ुदकुशी का शिकार 
वो साँसे आज भी रोज़मर्रा सी ही 
आती जाती देखती हैं
हमारी व्यवस्था और हमारे समाज को 
एक उपहास दृष्टि के साथ 
क्योंकि नियति ने लिख रखी हैं 
उसकी तमाम तमाम रोटियाँ 
उन्हीं हाथों में 
और उसका कुचलना भी 
हम आज कितना आगे निकल आये हैं 
आई फोन के युग में 
जहां एक बटन पर दौड़े चले आते हैं अनेक 
किसी की मदद को हूटर बजाते 
लाल नीली बत्तियां जलाते 
सौ कैमरों और सौ खबरजीवियों के लश्कर के साथ 
किन्तु पगडंडियों को मोहताज 
खामोश खलिहानों सीवानों ओसारों
डेरों और चुहानियों के देश में 
आज भी बुझ जाती है
शाम से पहले ही उम्मोदों की ढिबरी 
आँगन में पसर जाता है 
सफ़ेद पोश संस्कृतियों का रक्षक 
नैतिकता की सपाट छाती के ऊपर ।
 
                       - अभिनव अरुण 
                          {19122012}
 
 

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Comment by Ashok Kumar Raktale on December 24, 2012 at 9:24pm

आदरणीय अरुण 'अभिनव' जी वाह बहुत सुंदरता से सरकार और समाज के बीच कि विसंगति को उभरा है हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Abhinav Arun on December 21, 2012 at 3:03pm

आदरणीय श्री सौरभ जी , आपका उत्साहवर्धन मेरे लिए उर्जा का  स्रोत है । बहुत बहुत आभारी हूँ !

Comment by Abhinav Arun on December 21, 2012 at 3:02pm

  आदरणीया राजेश कुमारी जी रचना में उल्लिखित भावो को अपने पसंद किया हार्दिक आभार आपका !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 21, 2012 at 12:40am

जाने कितनी ही काली रातों की कलिमा में कितने ही भाग्यहीन सितारे टूट कर या तो विलीन ज़िन्दग़ी जीते रहते हैं, या सबल पंजों के हत्थे चढ़ अपने होने के मायनों पर लगातार सिर धुनते रहते हैं. इन्हीं बेचारों की भाग्यहीनता के कारण रात के अंधकार और दिन के उजाले में फ़र्क़ करना सीखा जाता है. ऐसे सितारों की दशा पर आपने मरहम लगा कर रचनाधर्मिता का निर्वहन किया है, भाई अरुण अभिनवजी.

इस कविता के लिए हार्दिक धन्यवाद व शुभकामनाएँ .. .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 19, 2012 at 11:19am

 दुखद है बहुत जो आहें ,आंसूं उस एकांत भयावह सन्नाटों में अविरल बह रहे हैं उसकी कोई चर्चा नहीं कोई कुछ भी करे उनकी व्यथा कोई नहीं हर सकता कोई उनके घावों पर मरहम भी किस मुख से लगाए बहुत मार्मिक चिंतनीय पोस्ट हेतु आभार 

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