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समय से परे, अगर जो कभी हम मिले
अलग से ही कुछ नाम से
अलग से ही रंग-रुप में
क्या तुम मुझे पहचान लोगे?

शायद मेरा स्पर्श या हृदय का स्पन्दन अलग हो,
मेरी बोली, मेरी अभिव्यक्ति अलग हो,
मेरा चेहरा या मेरे भाव अलग हो,
क्या तुम मुझे पहचान लोगे?

गर पवन बन मैं छु लूं तुम्हे,
या वृष्टि बन तुम्हारे रोम-रोम को भिगाउँ ,
नीर बन अगर में तुम्हारी प्यास बुझाउँ,
क्या तुम मुझे पहचान लोगे ?

अगर के बेल बन तुमसे लिपट जाउँ,
सागर की लहरें बन तुम्हारे चरणो में आउँ ,
या चाँदनी बन तुम पर छा जाउँ ,
क्या तुम मुझे पहचान लोगे?

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on December 25, 2012 at 6:55pm

वक्त यदि दिशाएं बदल दे तो ऐसे ही प्रश्न उठते हैं बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति. सादर हार्दिक बधाई स्वीकारें आद. अन्वेक्षा जी.

Comment by Anwesha Anjushree on December 19, 2012 at 2:40pm

Vijay Nikore , Saurabh Pandey, Dr Prachi Singh , Dr Ajay Khare ji and Rajesh Kumar Jha ji..Thanks a lot to all of U

Comment by राजेश 'मृदु' on December 18, 2012 at 1:15pm

बहुत कम अवसर ऐसे होते हैं जब इतनी सधी रचना से साक्षात्‍कार होता है, कहीं कोई अटक नहीं, कोई शब्‍दों से चमत्‍कार उत्‍पन्‍न करने की कोशिश नहीं सीधे बात करती है आपकी यह रचना

Comment by Dr.Ajay Khare on December 18, 2012 at 12:18pm

ANVESHA JI ITNI KOMAL ANUBHUTI KE LIYE BADHAI 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 18, 2012 at 9:59am

प्रेम की बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति..वाह!

हार्दिक बधाई इस रचना पर प्रिय अन्वेषा जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 17, 2012 at 11:24pm

प्रेम की पराकष्ठा ऐसे प्रश्नों से कितनी सुलभ लगती है ! बधाई.. .

सतत अभ्यासरत हों

Comment by vijay nikore on December 17, 2012 at 9:42pm

आदरणीय अन्वेषा जी,

वाह..वाह... वाह !

क्या बिम्ब हैं ! क्या भाव हैं ! क्या अभिव्यक्ति है !

आपको अनेकानेक बधाई।

विजय निकोर

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