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दूरियों की दूरी

मंज़िल की ओर बढ़ने से सदैव

दूरियों की दूरी ...

कम नहीं होती।

 

बात जब कमज़ोर कुम्हलाय रिश्तों की हो तो

किसी "एक" के पास आने से,

नम्रता से, मित्रता का हाथ बढ़ाने से,

या फिर भीतर ही भीतर चुप-चाप

अश्रुओं से दामन भिगो लेने से

रिश्ते भीग नहीं जाते,

उनमें पड़ी चुन्नटें भी ऐसे

                   कभी कम नहीं होतीं।

 

रिश्तों में रस न रहा जब शेष हो

तो पतझड़ के पेड़ों की सूखी टहनियों की तरह

टूट-टूट जाते हैं वह

ज़मीन पर गिरे सूखे पत्तों की तरह

वह पैरों के तले कुचले भी जाते हैं,

और इस पर भी हम मुँह में उँगली दबाए

वास्तविकता से अनभिज्ञ, बैठे सोचते हैं ...

हमने तो मित्रता का हाथ बढ़ाया था,

टहनी-से टूटते अबोध विश्वास को

संबल ही दिया था ... फिर यह क्या हुआ?

 

संभ्रमित हैं, भूलते हैं हम कि ऐसे में

दिलों की दूरियों को मिटाने के लिए,

विश्वास के पुन: पनपने के लिए,

"दोनों" के ख़्यालों की झंकार को,

"दोनों" के अनुबंध की अनुगूँज को,

एक ही "फ़्रिकुएन्सी" पर होना अनिवार्य है,

केवल एक को नहीं, पास दोनों को आना है।

 

दामन में कुछ पुराने कुछ और नए दर्द छिपाए

किंकर्तव्यविमूढ़

प्रत्याशा से ठगे-ठगे, हम बैठे सोचते हैं ...

यह संसार इतना निष्ठुर क्यूँ है?

तनिक भी झूठ-दिखावे को दूर रखे,

केवल सच्चाईयों से, इमानदारी से

इन दूरियों की दूरी कम क्यूँ नहीं होती? ... ??

                       ----------

                                                     विजय निकोर

                                                     vijay2@comcast.net  

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Comment by vijay nikore on December 14, 2012 at 8:04pm

आदरणीया प्राची जी, सुमन जी, आदरणीय अजय जी, श्याम जी, संदीप जी:

"दूरियों का दर्द" कविता की सराहना के लिए आपका आभार। ऐसे ही संबल

बनाए रखें।

सादर,

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 14, 2012 at 7:03pm

"दोनों" के ख़्यालों की झंकार को,

"दोनों" के अनुबंध की अनुगूँज को,

एक ही "फ़्रिकुएन्सी" पर होना अनिवार्य है,.....................बिलकुल सत्य कहा आदरणीय विजय निकोर जी, बिना इसके रिश्तों की दूरिया कम हो ही नहीं सकतीं . 

Comment by SUMAN MISHRA on December 14, 2012 at 11:46am

gahree aur gambheer soch me rachee basee kavita

Comment by Dr.Ajay Khare on December 14, 2012 at 11:31am

Adrniya vijay ji bhav badia he

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