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मँझा माफिया रोज, भूमि का करे कलेवा-

 

अय्यासी में हैं रमे, रोम रोम में काम ।
बनी सियासी सोच अब, बने बिगड़ते नाम ।

बने बिगड़ते नाम, मातृ-भू देती मेवा ।
मँझा माफिया रोज, भूमि का करे कलेवा ।

बेंच कोयला खनिक, बनिक बालू की राशी ।
काशी में क्यूँ मरे, स्वार्गिक जब अय्यासी ।।

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Comment by PHOOL SINGH on November 12, 2012 at 1:11pm

रवि जी प्रणाम.......

सुंदर अतिसुंदर भावपूर्ण रचना......"सपरिवार सहित आपको शुभ दीपावली"

फूल सिंह

Comment by लतीफ़ ख़ान on November 8, 2012 at 8:03pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी,,, वर्तमान परिदृश्य में आप के दोहे तीखा व्यंग हैं,,,रसोई की मारामारी को एक नारी ही समझ सकती है,,,हार्दिक बधाई ।

Comment by लतीफ़ ख़ान on November 8, 2012 at 7:48pm

श्री रविकर जी,,,सामयिक विषय पर आप की कुंडली एकदम सटीक है,,, हार्दिक बधाई,,,समय की नब्ज़ को पहचानना कोइ आप से सीखे,,,मेरा एक दोहा है,,,,,रोटी पर नित संसद में, होती है तक़रीर । जनता मरती भूख से , नेता खाते खीर ।।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 8, 2012 at 6:46pm

बहुत सुन्दर रचना रविकर भैया जी, बधाई स्वीकारे

 

बेच खनिक कोयला, पंडित भये बनिक का साला 

स्वर्गिक सा आनंद लेता, नित जावे वो मधुशाला 

Comment by रविकर on November 8, 2012 at 4:08pm

अंतिम दो पंक्तियों को ऐसे पढ़ें-सादर ----

बेंच कोयला खनिक, बनिक बालू की राशी ।

काशी में क्यूँ मरे, स्वार्गिक जब अय्यासी ।।

Comment by राजेश 'मृदु' on November 8, 2012 at 3:48pm

शानदार कुंडलियां हैं हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 8, 2012 at 3:44pm

रविकर भाई क्या व्यंग्य के रस में डुबोकर  कुंडली लिखी है 

Comment by akhilesh mishra on November 8, 2012 at 3:11pm

bahut badhiya .badhaiya.

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