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कहीं धूप में जले लोग
कहीं बर्फ में गले लोग

दर्दो-ग़म की बस्ती में
तन्हाई के काफ़िले लोग

बारूदों की तल्ख़ धूप में
खूं-पसीने से गिले लोग

बिन जुर्म जो काटे सज़ा
वो सलीब की कीलें लोग

कुछ पड़े हैं लाशों जैसे
कुछ हैं गिद्द-चीलें लोग

सागर थे जो सूख गए
बचे रेत के टीले लोग

खूं भी नहीं खौलता अब
नहीं होते लाल-पीले लोग

पाप अधम के बाजों पर
नाच रहे रंगीले लोग

दुनिया की फुलवारी पे
उग आये कंटीले लोग

बिन पैंदे के लोटे सब
नहीं रहे हठीले लोग

कंचन वर्ण सी काया में
कलुष भरे पतीले लोग

नफस नफ़स ज़हर भरा
दिखते नही नीले लोग
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

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Comment

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Comment by Kanchan Pandey on May 1, 2010 at 10:35am
दर्दो-ग़म की बस्ती में
तन्हाई के काफ़िले लोग
Behtarin kavita hai, aek aek shabd sadhey huwey, gr8
Comment by Rash Bihari Ravi on April 30, 2010 at 4:49pm
नफस नफ़स ज़हर भरा
दिखते नही नीले लोग

bahut badhia aasha ji
Comment by Sanjay Kumar Singh on April 30, 2010 at 12:23pm
कंचन वर्ण सी काया में
कलुष भरे पतीले लोग
Bahut hi sunder line hai, aaj key parivesh mey puri tarah sey sarthak, log dikhtey kuch aur hai aur hotey kuch aur hai, "Har pili chij sona nahi hoti" yey kahawat bilkul sahi hai, aur aapney bhi apani kavita key madhyam sey sayad yahi bataney ki koshish kii hai ki jo dikhta hai wahi sahi nahi hota,sab milakar aek achi rachna hai, bahut bahut dhanyabad hai aapka,

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 30, 2010 at 10:02am
खूं भी नहीं खौलता अब
नहीं होते लाल-पीले लोग

पाप अधम के बाजों पर
नाच रहे रंगीले लोग

आशा दीदी बहुत ही सुंदर रचना है ये आपका, इतनी खूबसूरती से जीवन के यथार्थ को रख दी है ,जिसका जितना भी तारीफ़ किया जाय वो कम है, बहुत बहुत आभारी है हम लोग आपका जो इतनी बहुमूल्य कविता से रूबरू होने का मौका मिला , अगले पोस्ट का सिद्दत से इंतजार रहेगा |
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on April 30, 2010 at 9:32am
asha jee pranam//....bahut acchi kavita hai ye aapki/......संभल के उड़ना ओ रे पंछी ke baad ey aaapki kavita bahut badhiya hai.....aapke dwara likhi gayi kavita संभल के उड़ना ओ रे पंछी sabhi ko bahut pasand aayi........
दुनिया की फुलवारी पे
उग आये कंटीले लोग

बिन पैंदे के लोटे सब
नहीं रहे हठीले लोग
bahut badhiya asha didi......aisi kavitaon ka aage bhi intezaar rahega........
Comment by Admin on April 30, 2010 at 8:41am
कुछ पड़े हैं लाशों जैसे
कुछ हैं गिद्द-चीलें लोग,

नफस नफ़स ज़हर भरा
दिखते नही नीले लोग,

आशा जी, प्रणाम, सबसे पहले मई आपको Open Books Online पर आपके द्वारा पोस्ट किये गये पहले ब्लॉग के लिये धन्यवाद देना चाहता हू, आप ने बहुत ही अच्छा कविता लिखा है जो जीवन के सचाई के बिलकुल नजदीक है जिसे सहज ही महसूस किया जा सकता है, आपकी उम्द्दा लेखन को हम लोग "संभल के उड़ना ओ रे पंछी" मे भी देख चुके है, ऐसी रचनाओ का हम सभी को आगे भी इन्तजार रहेगा |
आप सब का अपना
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