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तेरी भीगी निगाहों ने जब-जब छुआ है मुझे,
तेरा एहसास मिला तो कुछ-कुछ हुआ है मुझे,

फिसल कर छूट गया तेरा हाथ मेरे हाथों से,
सितम गर ज़माने से मिली बददुआ है मुझे,

लगी है ठोकर संभालना बहुत मुश्किल है,
घूंट चाहत का लग रहा अब कडुआ है मुझे, 

तरसती- बेबाक नज़रें ताकती हैं रास्तों को,
दिखा तेरी सूरत के बदले सिर्फ धुँआ है मुझे....

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Comment by अरुन 'अनन्त' on July 6, 2012 at 10:42am

शुक्रिया प्रवीण जी

Comment by प्रवीण कुमार श्रीवास्तव on July 6, 2012 at 7:52am
खूबसूरत ग़ज़ल ,बधाई
Comment by अरुन 'अनन्त' on July 5, 2012 at 5:12pm

बहुत - बहुत शक्रिया रेखा जी

Comment by Rekha Joshi on July 5, 2012 at 5:09pm

अरुण जी 

तेरी भीगी निगाहों ने जब-जब छुआ है मुझे,
तेरा एहसास मिला तो कुछ-कुछ हुआ है मुझे, सुंदर भाव ,बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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