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अन्तर्ध्वन्द

अमर प्रेम के अंकुर को ,
संकोच और अनजानी धूप ने,
यूँ झुलसाया,
पतझड़ आने को बौराया है,
मन बसंत में उलझा है,
उम्र ढलने को आई,
मन यौवन में अटका है,
संस्कार,मर्यादा,मान,परिधि,
सब पीछे छूटा,
मन विकल हो भागा,
रिश्ते नातों के फंदों से,
बुन गया यौवन सारा,
जब सबसे मुक्त हुआ,
मन बंधने को भागा........

अलका तिवारी

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Comment by Pooja Singh on October 6, 2010 at 4:30pm
अलका जी ,
प्रणाम बेहतरीन अभिव्यक्ति है यह {मन बसंत में उलझा है,
उम्र ढलने को आई,
मन यौवन में अटका है,
संस्कार,मर्यादा,मान,परिधि,
सब पीछे छूटा,
मन विकल हो भागा,} बधाई स्वीकार करे |
Comment by alka tiwari on September 23, 2010 at 10:41pm
ji bahut - bahut dhanyvaad, jaroor.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 23, 2010 at 9:24pm
अलका बहन पुनः आपने एक अच्छी रचना प्रस्तुत की है, प्राकृतिक बिम्बों को प्रतिक बना बहुत ही सुंदर रचना का सृजन किया है आपने, बहुत बहुत बधाई इस रचना पर, उम्मीद है आगे भी आपकी और रचनायें तथा अन्य रचनाओं पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणियाँ प्राप्त होती रहेंगी |

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