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हम पागल ही अच्छे

तेरी खामोशी
ये कहां ले आई मुझे
तेरी एक
हां के इंतजार में
बदल गए
रास्ते जिंदगी के
जाना था कहां
पहुंच गए यहां
तेरी राह
देखते-देखते
इरादे पस्त हो गए
अब तो यह आलम है
दिल रोता है
शब्द निकलते है
दुनिया हंसती है
और
कहती है मुझे पागल
कहती है तो कहे
हम पागल ही अच्छे
किसी को
गुमराह तो नहीं करते
बस यूं ही लिखते है
मन को शांत करते है
और क्या रखा है अब
यूं ही प्यार से मिलते है
शायद
किसी की दुआ
हो जाए मेरे नाम
और
ख़ामोशी के आलम में
बना डालू
शब्‍दों का ताजमहल

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Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on March 24, 2012 at 11:22am

तेरी खामोशी
ये कहां ले आई मुझे
तेरी एक
हां के इंतजार में
बदल गए
रास्ते जिंदगी के

श्री हरीश सर उच्च कहन के लिए एवं भावों को उद्घृत करने के लिए बधाई स्वीकार करें


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Comment by Saurabh Pandey on March 23, 2012 at 11:36pm

इस आत्म-सांत्वनापरक विचार पर आपको ह्आर्दिक धन्यवाद

Comment by AVINASH S BAGDE on March 23, 2012 at 7:10pm

अब तो यह आलम है

दिल रोता है

शब्द निकलते है

दुनिया हंसती है....किसी को
गुमराह तो नहीं करते
बस यूं ही लिखते है

हम पागल ही अच्छे....हरीश जी भाव

अच्छे है...

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 23, 2012 at 1:35pm

bahut khoob. badhai

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 23, 2012 at 12:33pm

आदरणीय हरीश जी,

अपनी ही दुनिया में रमे रहने के भाव लिए आपकी इस कविता ने बहुत प्रभावित किया| बधाई!

कृपया ध्यान दे...

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