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समय सँपेरा बीन बजाता छलता जाये

नागिन जैसी उम्र संग ले चलता जाये.

तन्त्र -मंत्र के जाल सुनहले पग पग पर हैं

नख शिख पल पल मोम सरीखा गलता जाये.

रीझ न जाओ माया नगरी पर जगती की

तारा ही है सूरज ,उगता ढलता जाये.

बंधन अच्छा लगता है जो प्रीति भरा हो

धागों में ही बँध इंसान सम्हलता जाये.

ईश्वर ने सुख-दु:ख की रचना कुछ ऐसे की

हो प्रकाश तब ही जब सूरज जलता जाये.

अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

विजय नगर, जबलपुर(म.प्र.)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 24, 2012 at 3:03pm

प्रवाहमय कविता के लिये आपका सादर धन्यवाद, भाई अरुण जी.

बंधन अच्छा लगता है जो प्रीति भरा हो .. बहुत सुन्दर !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 23, 2012 at 7:40pm

vaah arun ji jitni tareef karo is geet ki vo kam hi hogi.

Comment by AVINASH S BAGDE on March 23, 2012 at 7:34pm

हो प्रकाश तब ही जब सूरज जलता जाये...बहुत ही सुन्दर अरुण कुमार जी.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 23, 2012 at 12:18pm

तन्त्र -मंत्र के जाल सुनहले पग पग पर हैं

नख शिख पल पल मोम सरीखा गलता जाये.

रीझ न जाओ माया नगरी पर जगती की

तारा ही है सूरज ,उगता ढलता जाये.

आदरणीय अरुण जी,

बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक सम्प्रेषण के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें|

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on March 23, 2012 at 9:57am

बंधन अच्छा लगता है जो प्रीति भरा हो

धागों में ही बँध इंसान सम्हलता जाये.

अरुण सर जी भावपूर्ण एवं संदेशपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकार करें .

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 23, 2012 at 7:33am

BHAVNATMAK AUR PRAVAH PURN RACHNA HETU BADHAI.

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