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चरित्रहीन (लघु कथा)

धीरज दूध की डेयरी पर खड़ा दोस्तों के साथ गप्प मार रहा था. किसी भी लड़की को बात ही बात में चरित्रहीन कर देना उसकी बुरी आदत थी.  अभी किसी बात पर बहस हो ही रही थी कि सामने से एक लड़की आती हुई दिखी. धीरज अपनी आदतानुसार शुरू हो गया, " पता है कल्लू वो जो सामने से लड़की आ रही है न. उससे मेरी दोस्ती करीब एक साल तक रही. हम दोनों ने साथ-२ खूब मस्ती की." "पर धीरज वो लड़की तो देखने में बहुत शरीफ लग रही है फिर तेरे जैसे इंसान से उसने दोस्ती कैसे कर ली?" कल्लू ने हैरान हो पूछा. धीरज खिसियाते हुए बोला, "अबे साले वो देखने में ही सीधी लगती है लेकिन है बिलकुल चरित्रहीन. जाने कितनों से उसका याराना है."  तभी बगल में खड़े एक नौजवान ने धीरज का कॉलर पकड़ लिया, "वो लड़की ऐसी नहीं है. मैं उसे बचपन से जानता हूँ." धीरज घबराते हुए अकड़ा, "अबे कौन है तू और उस लड़की को कैसे जानता है.'' धीरज बेहोश होने से पहले केवल इतना सुन पाया, "मैं उस लड़की का सगा भाई हूँ."

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 30, 2011 at 6:15pm

मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़े मनबढुओं की नौटंकी को बड़े करीने से अभिव्यक्त किया है आपने, लघु कथा इम्पैक्ट छोड़ने में कामयाब है, बधाई स्वीकार करें सुमित प्रताप जी |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 30, 2011 at 12:44pm

लघु-कथा के विन्दु कैशोर्य वर्ग में व्याप गये छिछलेपन को इंगित करते हैं. सुमितजी के साहित्यिक विचारों के संवर्धन हेतु प्रस्तुत मंच समीचीन वातावरण दे.  इसी आशा के साथ उनका इस मंच पर स्वागत है.  इस ’लघु-कथा’ में वैसे अभी भी गुंजाइश है. किन्तु, यह अदम्य विश्वास भी जगाती है.

बधाई.

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