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दिवाली का रूप बदल गया

जब से दिल दिवाल हुआ है, दिवाली का रूप बदल गया.

जब से नियति मलिन हुई है, अर्द्धरात्रि में धूप निकल गया.

पर पीड़ा पर होने वाली, धड़कन जानें कहाँ गयी?

संवेदना- चेतना - निष्ठा, मानवता अब कहाँ गयी ?

जब से नफ़रत- क्रोध बसा है, इंसानों का रूप बदल गया.

जब से दिल दिवाल हुआ है, दिवाली का रूप बदल गया.

रीति - रिवाज़ में लोग  बाग. अब छिपकर सेंध लगाते हैं.

पटाखों के बीच, गोलियों का भी शोर मिलाते हैं.

जब से इसका चलन हुआ है, पर्व - त्यौहार का रूप बदल गया.

जब से दिल दिवाल हुआ है, दिवाली का रूप बदल गया.

स्पंदन करने वाला दिल, क्यों संवेदनहीन हुआ?

प्यार के धन से  जो अमीर था, क्यों अब इतना दीन हुआ?

निष्क्रियता - निष्ठुरता से, इस समाज का रूप बदल गया.

जब से दिल दिवाल हुआ है, दिवाली का रूप बदल गया.

इस दीपावली  पर हम सबको, एक वचन देना होगा.

भ्रष्टाचारी - व्यभिचारी का, हर हिसाब लेना होगा.

फिर सब देखेंगे कि कैसे, गाँव - नगर का रूप बदल गया.

जब से दिल दिवाल हुआ है, दिवाली का रूप बदल गया.

                  गीतकार - सतीश मापतपुरी

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