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सावन की चांदनी रात

सावन की ये अंजोरिया
झिलमिलाते चाँद -तारे
बादलों की आड़ से
लुक्का छिप्पी खेलते सारे
हलके हलके घनो से
हल्की बूंदों की रिमझिम
हर्षित मन को लगते न्यारे


शनै: शनै: पवन के झोखे
नीम पीपल आम के पत्ते
झींगुर के साथ और रतजगे
मिलकर किए निर्मित
कर्णप्रिये ध्वनि है मिश्रित


बसुधा से मिलन को बेताब
वो बूंद अम्बर से
आकर पत्तों पर गिरती
तब धरा को सर्वस्व मानकर
उससे आलिंगन करती
धरा और नभ के मिलन की
साक्षी है ये चांदनी रात
मनोरम मनमोहक निमग्न मिलन की
सावन की है चांदनी रात !!!


............रीतेश सिंह.

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Comment

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Comment by आशीष यादव on August 22, 2010 at 9:24am
ritesh ji pranaam,
bahut hi sundar kriti prastut ki hai aapne. bahut achchha laga padh kar. shabdo ka uchit prayog, jabardast|
ek baat bataeega saawan ki chandani raat, kaisi lagti hai aapko. kya waastaw me bahut khubsurat.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 22, 2010 at 7:03am
रितेश जी, सावन के महीने मे प्राकृतिक सौंदर्य देखते बनता है, आप की कविता प्राकृतिक सौंदर्य को बड़े नजदीक से महसूस करा पा रही है, बहुत ही सुंदर वर्णन, आप की रचनाओं का आगे भी इन्तजार रहेगा, अच्छा लिख रहे है, लेखनी को गतिशील रखे, बहुत बहुत बधाई इस खुबसूरत प्रस्तुति पर,

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 21, 2010 at 9:27pm
सावन का महिना और जोरदार बरसात ऐसे ही आपकी ये रचना भी जोरदार ...बहुत सुन्दर

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