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कुछ भी निजी कदापि नहीं होता

कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारा मांसाहारी  होना 
या हमारा  शाकाहारी होना 
स्वंय तक कभी सीमित नहीं होता 
कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारा भरपेट से ज़्यादा खाना 
किसी की थाली आधी रह जाना 
स्वंय तक कभी सीमित नहीं होता   
कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारा मंज़िल दर  मंज़िल बढ़ाते जाना 
किसी की झुग्गी का सिमटते चले जाना
 स्वंय तक कभी सीमित नहीं होता   
कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारे घर का दर तक  चुंधियाते जाना
किसी का कोना तक अँधेरा  रह  जाना 
 स्वंय तक कभी सीमित नहीं होता    
कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
न आग भेद  कर जलाती  देखी 
 न हवा कोई हुक्म बजाती देखी 
 न तूफ़ान को  घेरों में बंधते देखा 
 न धुप को अंधेरों में  धंसते देखा 
सब कुछ संक्रमणकारी  होता है सभी कुछ 
 सब कुछ संक्रमित  होता है सभी कुछ 
निजी से निजी सुख भी दुःख भी 
रोग भी शोक भी ,संयम भी भोग भी 
हर्ष भी विषाद भी ,प्रेम भी विवाद भी 
सब कुछ संक्रमित  होता है सभी कुछ  
 कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
 
सुदूर देश के  एक पांखी का श्राप भी 
करोड़ मील दूर के ताल का अभिशाप भी 
लील जाता रहा है समूचे ब्रह्माण्ड 
शक्तियों के थोथे  प्रचंड घमंड 
शेष किसी का भी कुछ भी नहीं रह पाता 
क्योंकि कुछ भी निजी नहीं होता 
सब कुछ संक्रमणकारी  होता है सभी कुछ  
इसलिए अपना सुख चाहो 
अथवा लम्बी उम्र की दुआ मांगो 
तो पड़ौसी को शामिल करते रहना 
क्योकि कुछ भी निजी नहीं होता  न दुआ न बद्दुआ  
सब कुछ संक्रमणकारी  होता है सभी कुछ .
.........................
मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by amita tiwari on April 30, 2020 at 3:11am

मान्य   सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप 'जी

आपकी टिप्पणी पर अवश्य विचार करूंगी   

आभार 

अमिता 

Comment by नाथ सोनांचली on April 23, 2020 at 1:53pm

आद0 अमिता तिवारी जी सादर अभिवादन। रचना के लिए बधाई । एक बात कहूँगा,, रचना गद्य सी हो गयी है। देखिएगा। सादर

कृपया ध्यान दे...

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