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Neeraj Dwivedi
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Life is Just a Life

किताब Kitab

उस दिनआँखों में आँखें डालकर तुमने कहा था कि किताब हो तुम अगर किताब हूँ तो पढ़ो तो कभी कभी पढ़ीं कई किताबें तुमने जरूरत की कहो या स्वार्थ की किसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए पर मेरी जिंदगी की किताब ने तुम्हारी कोई परीक्षा ली ही नहीं बस दी है अपने किताब होने की परीक्षा कभी रसोई में कभी घर के फर्श पर कभी वाशिंग मशीन के साथ और कभी रात में तुम्हारे बिस्तर पर जब जब तुमने मुझे पढने का अभिनय किया, तब...

ये तो बस कुछ पल होते हैं, जब इतना वैचैन होते हैं, और वो साथ नही ये जान, हम तो बस मौन होते हैं। होंठ विवश समझ, चल पडती है लेखनी इन पन्नों पर, कोशिश खुशी बाँटने की, पर पन्ने बस दर्द बयाँ करते हैं ... want to read Neeraj Dwivedi more? Visit http://poetry.neerajdwivedi.com

क्षणिका - जल्दी बीतो न Jaldi Beeton Na

क्षणिका - जल्दी बीतो न जल्दी बीतो न,दिन,रातऔर दूसरे समय के टुकड़ों ... तेज चलो नघडी की सुईयोंधक्का दूँ क्या ... ये टिक टिकजल्दी जल्दी टिक टिकाओ न … तुम्हारा क्या जाता है? -- नीरज द्विवेदी Jaldi beeto n, din, raat aur dusre samay ke tukdaon ... Tej chalo n ghadi ki suiiyon dhakka dun kya ... Ye tik tik jaldi jaldi tiktikao na ... Tumhara kya jata hai? -- Neeraj DwivediPlease be a follower and...

ये तो बस कुछ पल होते हैं, जब इतना वैचैन होते हैं, और वो साथ नही ये जान, हम तो बस मौन होते हैं। होंठ विवश समझ, चल पडती है लेखनी इन पन्नों पर, कोशिश खुशी बाँटने की, पर पन्ने बस दर्द बयाँ करते हैं ... want to read Neeraj Dwivedi more? Visit http://poetry.neerajdwivedi.com

शत प्रतिशत Shat Pratishat

शत प्रतिशत तुम होती होतो ये सच है कि सब कुछमेरे मन का नहीं होतामेरी तरह से नहीं होतामेरे द्वारा नहीं होतामेरे लिए नहीं होता ये भी सच हैकि मैं कवितायेँ नहीं लिख पाताकिताबें नहीं पढ़ पाताज्यादा काम नहीं कर पातामैं मशीन नहीं बन पाता दूसरे शब्दों में मैं वो सब कुछ नहीं कर पाता जिससे ये सिद्ध हो कि मैं हूँ ये सिद्द हो कि मै जिन्दा हूँ परपर जब तुम होती होतब मैं भी होता हूँऔर जीवित होता हूँशत प्रतिशत। --...

ये तो बस कुछ पल होते हैं, जब इतना वैचैन होते हैं, और वो साथ नही ये जान, हम तो बस मौन होते हैं। होंठ विवश समझ, चल पडती है लेखनी इन पन्नों पर, कोशिश खुशी बाँटने की, पर पन्ने बस दर्द बयाँ करते हैं ... want to read Neeraj Dwivedi more? Visit http://poetry.neerajdwivedi.com

मैं ही क्यों आखिर, हर बार टूटता हूँ? Main hi Kyon Akhir, Har Bar Tutta Hun

मैं ही क्यों आखिर, हर बार टूटता हूँ? हर जगह छूटता हूँ,मैं ही क्यों आखिर, हर बार टूटता हूँ? मैसूर में खोया जो, कावेरी के जल में,इतिहास की धरती पर, रिमझिम से मौसम में,उस खोये कतरे को,हर जगह ढूंढता हूँ ....हर जगह छूटता हूँ,मैं ही क्यों आखिर, हर बार टूटता हूँ? इस ईंट के जंगल से, क्यों मोह मुझे होगा,क्यों मील के पत्थर से, बिछोह मुझे होगा,गुडगाँव शहर में मैं,इक गाँव ढूँढता हूँ ....हर जगह छूटता हूँ, मैं...

ये तो बस कुछ पल होते हैं, जब इतना वैचैन होते हैं, और वो साथ नही ये जान, हम तो बस मौन होते हैं। होंठ विवश समझ, चल पडती है लेखनी इन पन्नों पर, कोशिश खुशी बाँटने की, पर पन्ने बस दर्द बयाँ करते हैं ... want to read Neeraj Dwivedi more? Visit http://poetry.neerajdwivedi.com

मैं खता हूँ Main Khata Hun

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ये तो बस कुछ पल होते हैं, जब इतना वैचैन होते हैं, और वो साथ नही ये जान, हम तो बस मौन होते हैं। होंठ विवश समझ, चल पडती है लेखनी इन पन्नों पर, कोशिश खुशी बाँटने की, पर पन्ने बस दर्द बयाँ करते हैं ... want to read Neeraj Dwivedi more? Visit http://poetry.neerajdwivedi.com
 

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ये तो बस कुछ पल होते हैं,

जब इतना वैचैन होते हैं,

और वो साथ नही ये जान,

हम तो बस मौन होते हैं।


होंठ विवश समझ,

चल पडती है लेखनी इन पन्नों पर,

कोशिश खुशी बाँटने की,

पर पन्ने बस दर्द बयाँ करते हैं


Website: Life is Just a Life

Neeraj Dwivedi's Blog

भारत और रेल का जनरल डब्बा

भारत और रेल का जनरल डब्बा

 

भरी ठसी बोगी में अक्सर मेरा देश चला करता है,

जनरल के डब्बे में जीकर बचपन रोज पला करता है।

 

हो चाहे व्यवसाय दुग्ध का,

रोज रोज का ऑफिस…

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Posted on January 3, 2014 at 11:00pm — 8 Comments

काँटों का जीवन: शोषित और उपेक्षित

काँटे, काँटे  क्यों  बनते  हैं,

बन  सकते हैं  जब वो फूल,

एक डाल पर एक रस पीकर,

कैसे  बन   जाते  हैं  शूल?…

Continue

Posted on May 4, 2012 at 8:30am — 7 Comments

मानव स्वयं सम्पूर्ण रहा है

दो चार दिनों का जीवन मेरा,

क्या पाया है  मैंने  अब तक,

मुझसे  कोई   क्या  सीखेगा,

कितनी दुनिया देखी अब तक।…

Continue

Posted on May 1, 2012 at 10:03pm — 5 Comments

उद्वेलित मानस

अरुणिम सूरज जिस दिन  मुझसे शर्त लगा झुक जाएगा,

जिस दिन सपनों के कानों में कोई सर्द आह भर जाएगा,

उस दिन भारत को  भेंट करेंगे  कफन एक सो जाने को,

जिस दिन बहता शोणित अपना  क्षार क्षार  हो जाएगा।।

 

तब तक चुप  कैसे हम हों  जब तक  छाती में गर्मी है,

जब  तक  स्वप्न  बाँध  पैरों में  भावों में  सरगर्मी है,

तब  तक  बेकल  इंतजार  करता…

Continue

Posted on April 28, 2012 at 8:30am — 6 Comments

Profile Information

Gender
Male
City State
गुडगाँव, हरियाणा
Native Place
कन्नौज, उत्तरप्रदेश
Profession
Software Engineer

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At 10:02am on March 20, 2012, PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA said…

mitra banane ke liye dhanyvaad. snehi niraj dwedi ji.

At 8:23am on March 1, 2012, Admin said…

 
 
 

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