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बिदाई गीत: अलविदा दो हजार दस... संजीव 'सलिल'

बिदाई गीत:

अलविदा दो हजार दस...

संजीव 'सलिल'

*

अलविदा दो हजार दस

स्थितियों पर

कभी चला बस

कभी हुए बेबस.

अलविदा दो हजार दस...

*

तंत्र ने लोक को कुचल

लोभ को आराधा.

गण पर गन का

आतंक रहा अबाधा.

सियासत ने सिर्फ

स्वार्थ को साधा.

होकर भी आउट, न हुआ

भ्रष्टाचार पगबाधा.

बहुत कस लिया

अब और न कस.

अलविदा दो हजार दस...

*

लगता ही नहीं, यही है

वीर शहीदों और

सत्याग्रहियों की नसल.

आम्र के बीज से

बबूल की फसल.

मंहगाई-चीटी ने दिया

आवश्यकता-हाथी को मसल.

आतंकी-तिनका रहा है

सुरक्षा-पर्वत को कुचल.

कितना धंसेगा?

अब और न धंस.

अलविदा दो हजार दस...

*******************

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Comment

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Comment by Lata R.Ojha on December 30, 2010 at 3:41pm

विदाई तो कर दी 'सलिल' जी साथ ही कटु सत्य को सामने भी खड़ा कर दिया आपने :) सबसे सुंदर लगी ये पंक्तियाँ - 

 लगता ही नहीं, यही है

वीर शहीदों और

सत्याग्रहियों की नसल.

आम्र के बीज से

बबूल की फसल.

Comment by Bhasker Agrawal on December 30, 2010 at 2:37pm
शब्दों का इस्तेमाल तो कमाल का है..बहुत खूब क्या विदाई दी है २०१० को !!!!

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