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किरणों को अभिशाप पड़ेंगी वे जिन जिन पर

कर देंगी परछाईं काली किसी पटल पर ।

हर जीवन के संग जनमती मृत्यु, अजय है

हर आशा में छुपा निराशा का भी भय है ॥

धन औ ऋण का योग बनाता सदा शून्य है

गोल शून्य सा भाल किन्तु रत धन औ ऋण में ।

हासिल जिसका शून्य पराजय वह कहलाती

किन्तु शून्य को छू पाऊँ तो अजय विजय है ॥

हर आशा में छुपा निराशा का भी भय है ॥

जन्मदिवस कि ख़ुशी प्रसव के पीर से उपजी

राम नाम का ज्ञान मरा में छुपा मिला था ।

शब्द तो कहते हैं, पर क्या यह बात सही है ?

हर बार निराशा के आखिर में आशा तय है ?

हर आशा में छुपा निराशा का भी भय है ॥

प्रदीप

17 /03 /2014

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 590

Comment

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Comment by Pradeep Kumar Shukla on March 17, 2014 at 9:27pm

Dhanyavaad  नादिर ख़ान sahab

Comment by नादिर ख़ान on March 17, 2014 at 8:03pm

बहुत उम्दा रचना है आदरणीय प्रदीप जी, जिंदगी का निचोड़ आपकी रचना मे समाहित है...

कितनी गहराई से सोच कर आपने इसे लिखा भाई कमाल है ।

Comment by Pradeep Kumar Shukla on March 17, 2014 at 2:01pm

is sundar kaavyatmak pratikriya ke liye haardik aabhaar  मनोज कुमार सिंह 'मयंक' ji, 

aapko bhi holi ke dheron shubhkaamnayein

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 17, 2014 at 9:35am

जन्म मृत्यु का चक्र वक्र हो या फिर सीधा |

कोटि कोटि ब्रम्हांड, काल ने सबको जीता ||

द्वैत भाव भाव दुर्धर्ष पराक्रम से जय होगा |

बिंदुमात्र अस्तित्व सिंधु बन कर लय होगा ||

उन्नत वैचारिक कविता के लिए कोटिशः बधाइयां आदरणीय प्रदीप भाई...सपरिवार,सस्नेह होली की हार्दिक शुभकामनाएं

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