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मौत की उम्मीद पर (ग़ज़ल)

मौत की उम्मीद पर जीने की आदत हो गयी
जिंदगी सूखे हुए पत्ते की सूरत हो गयी
ठंड ओलों की सही सूरज के अंगारे सहे
पीढ़ियों को पाल कर जर्जर इमारत हो गयी
चेहरा पैमाना बना है खूबियों का आज-कल
रंग गोरा है मगर गुमनाम सीरत हो गयी
धो दिया है तेज़ बारिश ने मकानों को मगर
टूटी फूटी झोंपड़ी वालों की शामत हो गयी
मैं! मेरा उत्कृष्ट सबसे! बाकी सब बेकार है
बस यही समझाने में अब हर जुबाँ रत हो गयी
©vrishty
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by V.M.''vrishty'' on October 14, 2018 at 4:41pm
आदरणीय शेख उस्मानी जी, सादर अभिनंदन! कोटिशः धन्यवाद मेरी रचना तक आने एवं सुंदर टिप्पड़ी के लिए।
सदैव स्नेह की आकांक्षी!!
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 14, 2018 at 4:24pm

जीवन-मृत्यु और सूरत-सीरत और स्वार्थी-वर्ग पर केंद्रित बेहतरीन सारगर्भित ग़ज़ल हेतु सादर हार्दिक बधाई आदरणीय वी. एम. 'वृष्टि' साहिब।

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