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हमने बाँट ली ज़मीन
फिर आसमान
अब बाँट लिए
चाँद सूरज और तारे
फिर बाँटा
देश-वेश, रहन- सहन
रंग-ढंग, जाति- प्रजाति
ख़ुदग़रज़ई
बढ़ती जा रही है.
अब हमने छुपा दिया है
सदभावना को, भाईचारे को
किसी गहरी खाई में.
हम अब नहीं बाँटना चाहते
सहज स्नेह
आमने- सामने..

.
(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 428

Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on February 29, 2016 at 1:43pm

साभार धन्यवाद सतविन्द्र कुमार jee.

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 25, 2016 at 4:51pm

बहुत ही पीड़ादायी है यह बंटवारा .हकीकत पर शानदार तंज.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on February 25, 2016 at 4:07pm

आ. कांता जी, साभार धन्यवाद.

Comment by kanta roy on February 25, 2016 at 11:11am
खुदगर्जी बढती जा रही है ..... आज के संदर्भ में बड़ी ही तंजदार प्रस्तुति हुई है आपकी आदरणीय डाॅ विजय प्रकाश जी । बधाई स्वीकार करें ।

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