हो गया ख़ाक इक शरारे में,
कुछ ना बाकी रहा बेचारे में.
देखो हालात क्या कराते हैं,
खुद शिकारी बंधा है चारे में.
हार खुद हम ही मान बैठे थे,
फर्क तो कम ही था किनारे में.
बात ऐसी है इसलिए चुप हूँ,
बात समझा करो इशारे में.
जो भी होगा वो देखा जायेगा,
अब तो कश्ती है अपनी धारे में.
जब कभी भी मैं सांस लेता हूँ,
सोचता हूँ तुम्हारे बारे में.
Comment
हार खुद हम ही मान बैठे थे,
फर्क तो कम ही था किनारे में
Bahut hi badhiya.
जब कभी भी मैं सांस लेता हूँ,
सोचता हूँ तुम्हारे बारे में.
बहुत खुबसूरत पंक्ति आप की जय हो..........................
हो गया ख़ाक इक शरारे में,
कुछ ना बाकी रहा बेचारे में.
देखो हालात क्या कराते हैं,
खुद शिकारी बंधा है चारे में.
bahut umda sher kahe hain
aapko bahut bahut badhai
हार खुद हम ही मान बैठे थे,
फर्क तो कम ही था किनारे में.
बात ऐसी है इसलिए चुप हूँ,
बात समझा करो इशारे में.
waah waah! Akhilesh ji bahut umda ghazal!
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