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बिना तुम्हें बताए

बिना तुम्हें बताए

अजीब प्रश्न हैं तुम्हारे

यूँ जैसेकि चक्रव्यूह

दिल-दिमाग भिड़ गए

बोलो किस माध्यम से उत्तर दूँ|

सच है! तुम्हारा जाना खलेगा

क्योंकि तुम्हारे जाने से बनेगा

एक शून्य |

जिसे सिर्फ़ तुम भर सकती हो

और मेरे आस-पास जो उदासी है

उसमें कलरव कर सकती हो||

पर तुम्हारा जाना भी बुरा नही है

क्योंकि मैं इससे व्यर्थ के सपने

देखने से बच सकता हूँ

अपनी दुनिया नए ढंग से रच सकता हूँ

कम कर सकता हूँ  तुम पर आश्रितता

जिससे खले ना तुम्हारे जाने पर ये रिक्तता |

रिश्ते उतने प्रगाढ़ होते हैं,जितना साथ दिया जाता है

पर जिनका जाना तय हो ,उन्हें हँसती निगाहों से

अलविदा किया जाता है|

इसलिए कहूँगा तुम्हें ”अलविदा”

जब भी तुम कहोगी–बस,अब जाना है!

बिना तुम्हें ये बताए कि-तुम्हारे कौन-कौन से

अक्स का ये दिल में दीवाना है  ||

.

सोमेश कुमार(२०१०),मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by गिरिराज भंडारी on January 3, 2015 at 8:22pm

बहुत सुन्दर रचना , आदरणीय सोमेश भाई , आत्मविश्वास किसी भी रंग मे आये अच्छा ही होता है । दिली बधाइयाँ स्वीकार कीजिये

Comment by Hari Prakash Dubey on January 2, 2015 at 6:34pm

अंतर्द्वंदों को दर्शाती सार्थक रचना , हार्दिक  बधाई सोमेश भाई ! अब आपका लेखन गद्य से पद्य की तरफ जा रहा है , शुभकामनायें , आपको !

Comment by khursheed khairadi on January 2, 2015 at 12:00pm

अपनी दुनिया नए ढंग से रच सकता हूँ

कम कर सकता हूँ  तुम पर आश्रितता

जिससे खले ना तुम्हारे जाने पर ये रिक्तता |

आदरणीय सोमेश जी ,सुन्दर भावाभिव्यक्ति है |सादर अभिनन्दन |

Comment by somesh kumar on January 2, 2015 at 11:05am

अनुमोदन के लिए धन्यवाद प्रेषित है आदरणीय|

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