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प्रोषितपतिका  मंदिर में स्थित देवता पर फूल चढाने वाली ही  थी कि उसका आठ वर्षीय बेटा दौड़ा हुआ आया और हांफते हुए बोला  -'मम्मी , पूरे दस महीने बाद आज डैडी घर आये है i'  इतना कह्कर लड़का वापस चला गया i माँ ने झटपट पूजा संपन्न की  और घर की ओर भागी i उसके पहुचते ही बेटे ने टिप्पड़ी की  माँ आपके दोनों पैरो में अलग - अलग किस्म की चप्पले है i  माँ ने झेप कर पैरो की ओर देखा फिर  लाज की एक रेखा सी उसके चेहरेपर दौड़ गयी i पतिदेव शरारत से मुस्कराये i

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Comment by kanta roy on June 4, 2016 at 10:46am

 नर्म ,मुलायम-सी  लघुकथा  है  ये , बेहद  खुबसूरत !  बहुत-बहुत बधाई  आपको आदरणीय डॉ गोपाल  नारायण  जी . 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 8, 2014 at 4:58pm

अरसे बाद प्रिय मिलन की खुशी में सुधबुध खोती प्रिया की दशा को बारीकी से शब्दबद्ध किया है 

हार्दिक बधाई आ० डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 7, 2014 at 11:48am

आदरणीय सौरभ जी

आपके दो शब्द मेरे लिए बहुत मायने रखते है  क्योंकि आपसे हमेशा कुछ सीखने को मिलता है i  सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 7, 2014 at 11:46am

आदरणीय गीतिका वेदिका जी

आपका हार्दिक आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 7, 2014 at 11:45am

सविता मिश्रा  जी

आपकी सराहना का आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 7, 2014 at 11:44am

महनीया

आपका प्रोत्साहन पाकर मन प्रसन्न हुआ i सादर i


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 4:31am

आत्मीयता और उतावलेपन को स्वर देने का प्रयास हुआ है. प्रोषितपतिका संज्ञा हालाँकि इस कथा में सहज मेल नहीं है. यदि यह लघुकथा किसी सत्य घटना पर आधारित है, तो भी.

बाकी विद्वद्जनों ने अधिक सार्थक कहा है.

सादर

Comment by वेदिका on July 2, 2014 at 10:53am
सुन्दर कथा! हार्दिक बधाई!
Comment by savitamishra on July 2, 2014 at 10:12am

 पुनर्मिलन की  भावुकता में होश खोना ...बहुत प्यारी अतिलघु कहानी ..दो शब्दों हजार बात 

Comment by कल्पना रामानी on July 2, 2014 at 9:38am

प्रिय से मिलने की उतावली में और बातों का होश ही कहाँ रहता है, अच्छी लघुकथा के लिए आपको हार्दिक बधाई  

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