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समय हमें क्या दिखा रहा है/गज़ल/कल्पना रामानी

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समय हमें क्या दिखा रहा है।

कहाँ ज़माना ये जा रहा है।

 

कोई बनाता है घर तो कोई,

बने हुए को ढहा रहा है।

 

बुझाए लाखों के दीप जिसने,

वो रोशनी में नहा रहा है।

 

गुलों को माली ही बेदखल कर,

चमन में काँटे उगा रहा है।

 

कुचलता आया जहाँ उसी को,

जो फूल खुशबू लुटा रहा है।

 

जो बीज बोकर उगाता रोटी,

वो भूख से बिलबिला रहा है।

 

हो बाढ़ या सूखा दीन का तो,

सदा ही खाली घड़ा रहा है।

 

खफा हैं क्यों काफिये बहर से,

गज़ल को ये गम सता रहा है।

 

ये “कल्पना” रब का न्याय कैसा,

दुखों का ही दिल दुखा रहा है। 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by कल्पना रामानी on May 3, 2014 at 9:27pm

आपकी मन हर्षाती  हुई प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीय सौरभ जी!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2014 at 12:43am

कई सार्थक अशार से सजे इस ग़ज़ल के लिए बधाई, आदरणीया कल्पनाजी.

खफा हैं क्यों काफिये बहर से,

गज़ल को ये गम सता रहा है।.............  ग़ज़ब !

सादर

Comment by कल्पना रामानी on April 11, 2014 at 6:42pm

आदरणीय विजय जी,सादर धन्यवाद

Comment by vijay nikore on April 8, 2014 at 12:45pm

//कुचलता आया जहाँ उसी को,

जो फूल खुशबू लुटा रहा है।//

गज़ल बहुत अच्छी लगी। हार्दिक बधाई।

Comment by कल्पना रामानी on April 7, 2014 at 8:22pm

आदरणीय ब्रह्मचारी जी,उत्साहवर्धन के लिए  सादर धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on April 7, 2014 at 8:19pm

आदरणीय गिरिराज जी गज़ल के शब्दों पर गौर करके आपने अपने विचार प्रकट किए, बहुत अच्छा लगा। मैंने "दुखों का  ही दिल  दुखा रहा है"ये शब्द बिम्ब स्वरूप लिए हैं। भावार्थ तो वही है। आपका हार्दिक धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on April 7, 2014 at 8:14pm

आदरणीया कुंती जी, प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद 

Comment by कल्पना रामानी on April 7, 2014 at 8:12pm

प्रिय बृजेश, स्नेहपूर्ण टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by S. C. Brahmachari on April 7, 2014 at 1:48pm
समय हमें क्या सीखा रहा है
कहाँ ज़माना ये जा रहा है ? ----- गजल की हर पंक्ति लाजबाब है । किस पंक्ति की प्रशंसा करूँ , समझ नहीं आता ।
हार्दिक बधाई स्वीकार करें !

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2014 at 12:59pm

आदरनीया कल्पना जी , लाजवाब गज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाइयाँ !! अंतिम शे र मे - दुखों के स्थान पर दुखी शायद और अच्छा लगे , सोच के देखियेगा !!

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