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ख़ता करके मुकर जाने की लत अच्छी नहीं लगती,
हमें इन लोगों की यारी, कोई यारी नहीं लगती ।

सियासत कर रहे हैं जो गरीबों का लहू पीकर,
उन्हें फिर से जिताने में, समझदारी नहीं लगती ।

मेरी आँखें तेरे दर पर हैं ठुकराई गयी, तब से
किसी की आँख की बूँदें, हमें मोती नहीं लगती।

करीने से सज़ाकर थे रखे कुछ काँच के टुकड़े,
मगर अब काँच की चूड़ी भी कुछ भोली नहीं लगती ।

बचाकर रखती थी चादर में, बर्फीली हवाओं से
माँ, अब मुझको शहर में उस कदर शर्दी नहीं लगती ।

निकलते गाँव से हमने रखा था साथ कुछ मीठा,
'सलिल', गुड की डली मीठी, यहाँ मीठी नहीं लगती ।

------------- आशीष नैथानी 'सलिल'

Views: 938

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Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 8, 2013 at 7:09pm

शुक्रिया डॉ नूतन डिमरी गैरोला जी.....

Comment by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on March 8, 2013 at 7:01pm

सुन्दर  गज़ल ... 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 14, 2013 at 8:36pm

जी 'नादिर जी'... सही कह रहे हैं आप | अपने ही अपनों को लूट रहे हैं |

Comment by नादिर ख़ान on February 14, 2013 at 12:46pm
सियासत कर रहे हैं जो गरीबों का लहू पीकर,
उन्हें फिर से जिताने में, समझदारी नहीं लगती ।
बहुत समझदारी की बात की आशीष जी आपने पर क्या करें जिसे अपना समझो वही अपना नहीं होता ....

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 13, 2013 at 11:09pm

शुक्रिया उपासना जी एवं वेदिका जी...

Comment by वेदिका on February 13, 2013 at 5:30pm

किसी की आँख की बूँदें, हमें मोती नहीं लगती.....

 सुंदर उपमा...!

Comment by upasna siag on January 24, 2013 at 4:02pm

बहुत सुन्दर......

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on January 21, 2013 at 7:00pm

आदरणीय प्राची जी, आपने ग़ज़ल की छोटी बातों को महसूस किया । शुक्रिया |

आपकी दाद, सादर क़ुबूल करता हूँ  ।

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on January 21, 2013 at 6:58pm

आदरणीय आचार्य जी, ग़ज़ल आपके मन को भाई, शायद मेरी मेहनत साकार हो गयी ।  प्रणाम |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 21, 2013 at 6:04pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल, 

हर एक शेर बिलकुल दिल से महसूस करके, लिखा गया है, 

बहुत सुन्दर, हार्दिक दाद क़ुबूल फरमाएं आ. आशीष जी 

कृपया ध्यान दे...

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