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गजल कहने की कोशिश जारी है-

मोटी-चमड़ी पतला-खून ।
नंगा भी पहने पतलून ।

भेंटे नब्बे खोखे नोट -
भांजे दर्शन अफलातून ।

भुना शहीदी दादी-डैड
*शीर्ष-घुटाले लगता चून ।
*सिर मुड़ाना / चोटी के घुटाले

पंजा बना शिकंजा खूब-
मातु-कलेजी खाए भून ।

मिली भगत सत्ता पुत्रों से
लूटा तेली लकड़ी-नून ।

दस हजार की रविकर थाल
उत फांके हों दोनों जून ।

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Comment by Arun Sri on November 6, 2012 at 12:50pm

दस हजार की रविकर थाल
उत फांके हों दोनों जून । ...... वाह ! क्या कहने ! खूब कहा आपने !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 5, 2012 at 10:48am

//मुझे तो समझ ही नहीं आती है यह विधा-
पर आकर्षक लगती है-//

आजकल गंगा अविरल धार में है. आप अवश्य हाथ माँज लें, प्रभु.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 5, 2012 at 10:39am
मोटी-चमड़ी पतला-खून । नंगा भी पहने पतलून । 
मिली भगत सत्ता पुत्रों से लूटा तेली लकड़ी-नून । 
फाके मारे दो जून, शायरी का चढ़ा जूनून,रविकर भैया बहुत खूब 
Comment by रविकर on November 5, 2012 at 10:33am

पता नहीं आदरणीय सौरभ जी -
मुझे तो समझ ही नहीं आती है यह विधा-
पर आकर्षक लगती है-
अपनी तरफ से कुछ आशीष देने का कष्ट करें-
कृपा होगी ||


मैंने आ. वीनस जी से भी यह निवेदन किया हुआ है-
सादर ||


आदरेया सीमा जी का आभार ||
बहन शालिनी का आभार ||
आदरणीय बागी जी आभार |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 5, 2012 at 10:20am

ग़ज़ब का सटायर भाई रविकर जी. इस तंज पर अब क्या कहूँ, शक्करपारे में आपने गोया निबौरी भर दिया है.

लेकिन ग़ज़ल की शिल्प पर अभी बहुत कुछ करना है, प्रभु.  ग़ज़ल की बह्र क्या रखा है या मिसरों को आपने किस वज़्न में बाँधने की कोशिश की है, यदि आप साझा करें तो आगे कुछ कहना संभव हो सके.

Comment by shalini kaushik on November 4, 2012 at 3:01pm

भुना शहीदी दादी-डैड 
*शीर्ष-घुटाले लगता चून ।

very nice presentation 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 4, 2012 at 11:13am

छोटी बहर पर अच्छी ग़ज़ल , बधाई आदरणीय रविकर जी ।

Comment by seema agrawal on November 4, 2012 at 10:43am

आपका विशेष  तीखा अंदाज़ आपकी ग़ज़ल में भी बरकरार है 

पंजा बना शिकंजा खूब- 
मातु-कलेजी खाए भून ।

दस हजार की रविकर थाल 
उत फांके हों दोनों जून ।

बधाई रविकर जी 

Comment by रविकर on November 4, 2012 at 9:47am

आदरणीय भाई वीनस जी -
आपकी गजल कक्षा से भी सीखने की कोशिश कर रहा हूँ-
कुछ टिप्स इस रचना पर भी मिले तो अच्छा -
गजल के हिसाब से इसमें क्या क्या कमी है-
हमेशा जानना चाहूँगा -
और अगली बार उस पर भी काम करूँगा -
कृपया--
सादर |

Comment by वीनस केसरी on November 3, 2012 at 11:42pm

दस हजार की रविकर थाल
उत फांके हों दोनों जून ।

वाह वा वा ....

कृपया ध्यान दे...

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