For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ये कैसी डोरी बंधन की,  है जैसे कच्चे रेशम की..
डर लगता है टूट न जाए, साथ कहीं ये छूट न जाए..
 
इस से मन के तार जुड़े हैं, सपनों के संसार जुड़े हैं..
सप्त सुरों में इसकी लय है, हर सावन इस की ही शय है..
 
गुँथे हुए सतरंगी धागे, थाम जिसे धड़कन भी भागे..
जीवन में हर रंग इसी से, श्वांसों घुले तरंग इसी से..
 
थाम इसे  छू लूँ मैं अंबर, पार करूँ मैं गहरा सागर..
अग्नि समंदर भी तैराए, अच्युत अजय पद हस्त सजाए..
 
अटल ये आँधी तूफानों में,  संग हमेशा वीरानों में..
ये मरुधर में सावन भर दे, अन्धकार को ज्योतित कर दे..
 
इसमें रब की बसी दुआ है, जैसे खुद ये एक खुदा है..
रब मुझसे ये रूठ न जाए, साथ कहीं ये छूट न जाए..
 
हाथ उठा कर नयन बसा कर, है वंदन तेरा करुणाकर..
चेतनता की हर मंजिल में, संग बसे ये मेरे दिल में..
 

Views: 453

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2012 at 9:08pm

आ. सुरेन्द्र कुमार शुक्ला जी, इस रचना को सराहने हेतु आपका ह्रदय से आभार

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 1, 2012 at 11:44pm

इसमें रब की बसी दुआ है, जैसे खुद ये एक खुदा है..

रब मुझसे ये रूठ न जाए, साथ कहीं ये छूट न जाए..
 
हाथ उठा कर नयन बसा कर, है वंदन तेरा करुणाकर..
चेतनता की हर मंजिल में, संग बसे ये मेरे दिल में..
आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी ..बहुत सुन्दर छंदोबद्ध रचना ये डोरी बंधन की ...ये बंधन हमारे अंतर में और प्रगाढ़ हो ..प्रेम उपजे और प्रभु सदा इस पर कृपा बरसाते रहें सब सरस हो जाए ..
 ..जय श्री राधे 
भ्रमर ५ 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 1, 2012 at 5:44pm

 

आदरणीय सौरभ जी,
आपका हार्दिक आभार इस कृति को सराहने के लिए व चौपाई छंद पर प्रकाश डालने के लिए.
जितने नियम इन छंदों के स्थूल व दृश्य हैं, उनसे कहीं ज्यादा सूक्ष्म हैं...
जिन्हें सिर्फ सतत अभ्यास व स्वाध्याय  से ही साधा जा सकता है.
एक विशिष्ट मात्रिक विन्यास ही हिन्दी छंदों में सरस गेयता व माधुर्य लाता है.
आपके द्वारा  विधाओं पर सतत मार्गदर्शन हमारी रचनाओं को आवश्यक तत्व  जरूर प्रदान करेगा.
आपका पुनः आभार.  

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 1, 2012 at 3:55pm

रचना बहुत ही सुन्दर बन पड़ी है, डा. प्राची.  उच्च बंधन को साधती जिस ’डोरी’ का आपने वर्णन किया है वह अंतर में अटूट विश्वास के उपजने का कारण होती है. यह विश्वास ही एक मुग्धा की अस्मिता को विस्तार देता है.  इस आध्यात्मिक तथ्य का भरपूर हामी भरती इस रचना के लिये आपको हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ.  

सोलह की मात्रा के चरण हों, और पद बनें तो छंद चौपाई कहलाते हैं.  किन्तु, छंद मात्राओं की गिनती मात्र पर नहीं साधे जाते बल्कि उनका अपना सुर हुआ करता है. 

उस हिसाब से पहली पंक्ति का पहला पद कुछ यों लिखा जाय तो चौपाई के सुर के अनुरूप दोनों चरण होंगे -

ये कैसी बंधन की डोरी । रेशम-रेशम कच्ची कोरी ॥

या इसी तरह से कुछ.  ..

आपकी इस भावप्रवण रचना के लिये पुनः बधाइयाँ

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
Wednesday
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Feb 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Feb 28

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service