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Samar kabeer's Blog – April 2017 Archive (4)

क़दम उठाने से पहले विचार करना था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



(आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ करें और शैर का लुत्फ़ लें)



अगर वफ़ा का चलन इख़्तियार करना था

क़दम उठाने से पहले विचार करना था



ये एक बार नहीं बार बार करना था

बग़ैर नाव के दरिया को पार करना था



हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैं

ग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना था



उठाके बोझ ज़माने का तेरी चाहत में

शऊर-ओ-फ़िक्र की सरहद को पार करना था



वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता

उसी… Continue

Added by Samar kabeer on April 20, 2017 at 12:04am — 31 Comments

तरही ग़ज़ल नंबर-3

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

(मक़्ते में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ को नज़र अंदाज़ कर दें)



रफ़्ता रफ़्ता सारी अफ़वाहें कहानी हो गईं

तल्ख़ियाँ इतनी बढ़ीं रेशा दवानी हो गईं



हिज्र की रातों में इतनी बार उनके ख़त पढ़े

याद मुझको सारी तहरीरें ज़बानी हो गईं



हाल वो देखा ग़ज़ल का आज यारो,शर्म से

'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की भी रूहें पानी पानी हो गईं



क़ह्र को बाँधें क़हर वो और टोको तो कहें

शे'र कहने की ये तरकीबें पुरानी हो गईं



जानते हो ख़ूब यारो ओबीओ के मंच… Continue

Added by Samar kabeer on April 9, 2017 at 12:13am — 37 Comments

तरही ग़ज़ल नंबर-2

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन



आज तारीफ़ें मिरी उनकी ज़बानी हो गईं

हासिदों की देख शकलें ज़ाफ़रानी हो गईं



उनके रुख़सारों की गर्मी अलअमाँ सद अलअमाँ

सब चटानें बर्फ़ की यकलख़्त पानी हो गईं



आज हैं मासूम सीता की तरह ये रावणों

क्या करोगे लड़कियाँ गर ये भवानी हो गईं



देखते थे कल हिक़ारत से हमें वो देख लें

किस क़दर नस्लें हमारी आज ज्ञानी हो गईं



मैं तो हूँ ख़ामोश लेकिन लोग कहते हैं "समर"

तेरी ग़ज़लें एह्ल-ए-दिल की तर्जुमानी हो… Continue

Added by Samar kabeer on April 6, 2017 at 12:29am — 31 Comments

ओबीओ की सातवीं सालगिरह का तोहफ़ा

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

(एक शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ कर दें)





जो कहूँ जो लिखूँ ओबीओ के लिये

यूँ समर्पित रहूँ ओबीओ के लिये



माँगता हूँ यही आजकल मैं दुआ

जब तलक भी जियूँ ओबीओ के लिये…



Continue

Added by Samar kabeer on April 1, 2017 at 2:30pm — 43 Comments

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dandpani nahak commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post एक नया दस्तूर (ग़ज़ल - शाहिद फिरोज़पुरी)
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