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Asif zaidi
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Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"आदरणीय dandpani nahak जी बहुत बहुत धन्यावाद अपना कमती समय देने के लिये मैंं पूरी कोशिश करूंंगा।"
Jun 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"मोहतरम तहे दिल से शुक्रिया जनाब "
Jun 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"आदरणीय जनाब अरुण कुमार निगम जी बहुत बहुत शुक्रिया आपकी नज़्र ए इनायत का सादर"
Jun 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"मोहतरम उस्ताद जनाब समर कबीर साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिया तवज्जो और ग़ौर ओ फ़िक्र के लिए आपका एक-एक लफ्ज़ सनद व रहनुमाई है । मैं फिर से कोशिश करुंगा के ग़लतियाँ कम से कम हों आप जो इस्लाह कर रहे हैं उससे मुझे भी फ़ायदा है और दूसरों को भी मैं मशकूर व…"
Jun 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"आदरणीय गिरिराज भंडारी जी बहुत बहुत  शुक्रिया आपकी तवज्जो का "
Jun 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"बहुत अच्छी कोशिश आदरणीय सुरेन्द्र इन्सान जी बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें सादर।"
Jun 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"*ग़ज़ल* न तो गौहर, न वो जौहर, न सुख़न्वर निकला। सब ने जिसको कहा बरतर वही कमतर निकला।। रफ़्ता-रफ़्ता मेरे अहसास पे नश्तर ये लगा। मैंने जिस हाथ को चूमा वही ख़ंजर निकला।।(तरह) जिसकी क़ीमत न ज़माने में लगी हो अब तक। नौक-ए-नैज़ा पे जो गोया था वही…"
Jun 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"*ग़ज़ल* न तो गौहर, न वो जौहर, न सुख़न्वर निकला। सब ने जिसको कहा बरतर वही कमतर निकला।। रफ़्ता-रफ़्ता मेरे अहसास पे नश्तर ये लगा। मैंने जिस हाथ को चूमा वही ख़ंजर निकला।।(तरह) जिसकी क़ीमत न ज़माने में लगी हो अब तक। नौक-ए-नैज़ा पे जो गोया था वही…"
Jun 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"*ग़ज़ल* न तो गौहर, न वो जौहर, न सुख़न्वर निकला। सब ने जिसको कहा बरतर वही कमतर निकला।। रफ़्ता-रफ़्ता मेरे अहसास पे नश्तर ये लगा। मैंने जिस हाथ को चूमा वही ख़ंजर निकला।।(तरह) जिसकी क़ीमत न ज़माने में लगी हो अब तक। नौक-ए-नैज़ा पे जो गोया था वही…"
Jun 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" स्वर्ण जयंती अंक-50
"बहुत बहुत बधाई आदरणीय Mahendra Kumar जी बेहतरीन पेशकश की स्वीकार किजिये "
May 30
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" स्वर्ण जयंती अंक-50
"आदरणीय विनय कुमार जी बहुत बहुत आभार आपकी तवज्जो के लिए "
May 30
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" स्वर्ण जयंती अंक-50
"बहुत शुक्रिया उस्मानी साहब अभी आप लोगों से और भी बहूत कुछ सीखना है मोहतरम"
May 30
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" स्वर्ण जयंती अंक-50
"*लघुकथा 'क्या लाया'*सवेरे उसकी पत्नी की चीखने चिल्लाने, कोसने की आवाज़ ने उसकी नींद उड़ा दी पता नहीं रात देर कब नींद लगी थी, सोचने लगा अब मैं क्या करूं, पत्नी के ताने, लोगों के सवाल,क्या ख़ुद से लड़ूं, मैं तो जीवन भर का मज़ाक बनकर रह गया,…"
May 30
Asif zaidi posted a blog post

चाँद बता तू कौन हमारा लगता है

चौदहवीं पे कितना प्यारा लगता है। कितना दिलकश ये नज़्ज़ारा लगता है।।आँख मिलाए और कभी शर्माए तू। चांद बता तू कौन हमारा लगता है।।चांदनी हरदम पास हमारे रहती है। चांद मगर क्यों हमसे पराया लगता है।।तुझसे पहले आंखों में यह चुभते हैं। तुझ पे क्यों तारों का पहरा लगता है।।उसका अक्स जो पलकों में धर लेते हैं। क़ैदी सा फिर चांद हमारा लगता है।।आसिफ़ तुम दरिया बन जाते हो जो कभी। उसमें तुम्हारा चांद नहाया लगता है।।मौलिक व अप्रकाशितSee More
May 27
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 97 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय Satyanarayan Singh जी बहुत बहुत बधाई बढ़ििया प्रस्तुति पर"
May 19
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 97 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी बहुत बहुत बधाई शानदार मंज़र कशी सादर ।"
May 19

Profile Information

Gender
Male
City State
Ujjain
Native Place
Ujjain
Profession
Poet

Asif zaidi's Blog

चाँद बता तू कौन हमारा लगता है

चौदहवीं पे कितना प्यारा लगता है।

कितना दिलकश ये नज़्ज़ारा लगता है।।

आँख मिलाए और कभी शर्माए तू।

चांद बता तू कौन हमारा लगता है।।

चांदनी हरदम पास हमारे रहती है।

चांद मगर क्यों हमसे पराया लगता है।।

तुझसे पहले आंखों में यह चुभते हैं।

तुझ पे क्यों तारों का पहरा लगता है।।

उसका अक्स जो पलकों में धर लेते हैं।

क़ैदी सा फिर चांद हमारा लगता है।।

आसिफ़ तुम दरिया बन जाते हो जो कभी।

उसमें तुम्हारा चांद…

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Posted on May 26, 2019 at 12:30am

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At 10:14pm on April 13, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय आसिफ़ ज़ैदी साहब हौसला बढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया
At 3:20pm on March 6, 2019, Ahmed Maris said…

Good Day,

How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day

Thanks God bless

Stella.

At 11:43pm on February 23, 2019, dandpani nahak said…
बहुत शुक्रिया आदरणीय आसिफ़ ज़ैदी साहब
At 9:47am on January 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय आसिफ़ ज़ैदी साहब
आपका बहुत बहुत शुक्रिया
 
 
 

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