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197 गति और प्रगति
कहा जाता है कि यह व्यक्त जगत देश, काल और पात्र (अर्थात् टाइम, स्पेस और पर्सन) के अनुसार गतिशील है। अव्यक्त स्थिति में देश, काल और पात्र न होने से गतिशीलता भी नहीं है । प्रत्येक अस्तित्व गतिशील है, हमारे शरीर का प्रत्येक स्नायुतन्तु, स्नायुकोष, खून की प्रत्येक बूॅंद , मन, सभी कुछ गतिशील बना हुआ है। क्यों? इसलिए कि गति जीवन का धर्म है और गतिहीनता है मृत्यु। विद्वान लोग कहा करते हैं कि मन को स्थिर बनाओ, यह कहना त्रुटिपूर्ण लगता है क्योंकि यदि मन रुक गया तो उसकी प्रगति भी रुक जाएगी। इसलिए यह कहना उचित होगा कि अनेक दिशाओं में भटकते मन को एक विशेष दिशा में चलाओ क्योंकि देश, काल और पात्र के भीतर जो रहेंगे उन्हें चलना ही पड़ेगा चाहे वे चाहें या नहीं चाहें। दस पन्द्रह हजार वर्ष पहले मानव समाज जहाॅं था आज उससे बहुत आगे बढ़ चुका है क्यों? गतिशीलता के कारण ही। यदि कोई कहे कि पाॅंच हजार साल पहले की सामाजिक व्यवस्था ही अच्छी थी तो क्या वापस लौटना सार्थक होगा? नहीं हम आगे बढ़ते हुए और अच्छी सामाजिक व्यवस्था बनाएंगे, आगे बढ़ेंगे, गति ही नहीं प्रगति करेंगे; ‘‘चरैवेति चरैवेति’’ यही है जीवन धर्म।
यह गति एक सी बनी रहती है या उसमें प्रगति भी होती है यदि हाॅं तो कैसे होती है ?

मानलो एक वैज्ञानिक, लेबोरेटरी में बैठा चिन्तन कर रहा है कि मैं अमुक रोग की दवा बनाऊॅंगा तो दवा बनने से पहले मन में बन गई। इस व्यक्त जगत अर्थात् सृष्टि की प्रथम उत्पत्ति ब्राह्मिक मन में अर्थात् काॅस्मिक माइंड में हुई । मन का यह बीज जब अधिक शक्तिशाली हो जाता है तब इसका चित्ताणुगत ढाॅंचा पदार्थ के रूप में अर्थात् जड़ पदार्थ में रूपान्तरित हो जाता है। ब्रह्मचक्र अर्थात् ‘कॅास्मिक साइकिल’ के विकास के क्रम में इसे संचरधारा कहते हैं। जो बात काॅस्मिक माइंड के बारे में सच है वही एकाई जीव के इकाई मन के संबंध में भी सही है। मानसिक जगत में बाधाओं के कम होने से गति तेज होती है परन्तु मानस धातु जब जड़ में रूपान्तरित होना शुरु करता है अर्थात् पंचभूत में रूपान्तरित होते होते जब पदार्थ बन जाता है तो उसकी गति कमजोर हो जाती है। इसे आगे बढ़ने के लिए फिर से किसी चोट अर्थात् बल की आवश्यकता होती है जिसके कारण जड़ धातु पुनः चित्ताणु में रूपान्तरित हो जाती है और उसमें फिर से यह इच्छा जागती है कि मैं अपनी पुरानी जगह पर पहुॅंच जाऊॅं।  उस छोटे से मन में यदि अपने मूल स्तर को पाने की इच्छा जाग जाती है तब वह परमात्मा की ओर चलने लगता है । विकास के इस क्रम में यही प्रगति की प्रतिसंचर धारा कहलाती है। प्रतिसंचर में मन को अपनी  भौतिक संरचना के साथ रहना पड़ता है जो प्रायः जड़ता के आकर्षण में होने के कारण अग्रगति में बाधा का अनुभव करता है। यदि जड़ के आकर्षण से पृथक रहता तो सीधे परमपुरुष में ही मिल जाता । चूॅकि आकर्षण विश्व का नियम है इसलिए प्रत्येक संरचना विश्व के प्राणकेन्द्र के चारों ओर दौड़ रही है और केन्द्र की ओर बढ़ना चाह रही है, चाहे वह छोटी हो या बड़ी। यदि कोई अस्तित्व केन्द्र से दूर जाता प्रतीत होता है तो यह विकर्षण नहीं वरन् ऋणात्मक आकर्षण ही कहा जाएगा क्योंकि वहाॅं आकर्षण के अलावा कुछ नहीं है।

आधुनिक वैज्ञानिक भी यह कहते हैं कि गुरुत्वाकर्षण ही मात्र वह बल है जिसमें केवल आकर्षण होता है विकर्षण नहीं । यह अलग बात है कि वे अभी इस गुरुत्वाकर्षण के उद्गम के कारण को नहीं जानते इतना ही नहीं वे ‘स्पेस टाइम’ को परस्पर गुथा हुआ तो मानते हैं परन्तु उनका उद्गम कहाॅं से हुआ यह अभी भी उनके लिये शोध का कठिन विषय है। ‘कॅस्मिक माइंड’ और ‘काॅस्मिक साइकिल’ को वे नहीं मानते परन्तु काॅस्मस और उसके भीतर सेलेस्टियल वाॅडीज अर्थात् गेलेक्सीज व ब्लेक होल बगैरह को वे प्रकृति का खेल मानते हैं।

तो, बात चल रही थी अणुमानस की गति की, उसकी प्रगति की । अणुमानस की मूल प्रकृति होती है परमसत्ता की ओर जाने की, इसलिए जब यह आकर्षण के कारण आगे की ओर बढ़ता है तो अन्य अनेक अणुमानस भी परस्पर मिलते हैं और इसके फलस्वरूप बनता है ‘प्रोटोजोइक माइंड’ । इसी प्रकार की अग्रगति में त्वरित होकर अणुमानस पा लेता है एककोशीय शरीर अर्थात् ‘यूनीसेल्युलर वाॅडी’ तथा प्रगति के इसी क्रम में आगे प्रोटोजोइक माइंड रूपान्तरित हो जाता है ‘मेटाजोइक माइंड’ और ‘मल्टी सेल्युलर वाॅडी’ में। प्रगति का क्रम अभी समाप्त नहीं होता, यह मेटाजोइक माइंड ज्योंही कुछ मानसिक शक्ति अर्जित कर लेता है वह अन्य मेटाजोइक स्ट्रक्चर के सम्पर्क में आकर अधिक जटिल मन का निर्माण करता है और आगे आने वाली बाधाओं से जूझते हुए क्रमशः अनुन्नत जानवर, उन्नत जानवर के रूप में प्रगति कर लेता है। इसे कहते हैं स्वाभाविक प्रगति। स्वाभाविक प्रगति पथ पर मेटाजोइक मन की संरचना जटिल होती जाती है और ज्योंही उसे उपयुक्त आधार मिलता है मेटाजोइक शरीर भी अधिक जटिल हो जाता है। इस अधिक जटिल मेटाजोइक मन को कहते हैं मनुष्य का मन और अधिक मेटाजोइक संरचना को कहते हैं मनुष्य का शरीर। बहुकोशीय मन की गति बहुत अधिक होती है अतः वह कुछ भी कर सकता है , सब कुछ कर सकता है। इसलिए यहाॅं आकर प्रगति का अंतिम स्तर पाना ही उसका लक्ष्य होता है और वह है जहाॅं से चले थे वहीं वापस जा पहॅुचना अर्थात् परमसत्ता में मिल जाना । इसलिए, मानव के मन को सही दिशा में त्वरित गति देने के लिए उसकी छिपी हुई शक्ति को उचित दिशा अर्थात् परमात्मा की ओर जाने की दिशा देते रहने का कार्य करना पड़ता है अन्यथा वह वस्तु जगत की ओर मुड़ कर ऋणात्मक आकर्षण के प्रभाव में आकर केन्द्र से दूर जाने लगता है और अपनी प्रगति खो देता है। उचित दिशा देने का  कार्य जिससे किया जाता है उसे कहते हैं बीज मंत्र या इष्ट मंत्र। अपने इष्ट मंत्र को जान लेने के बाद लगातार उसकी मदद लेते रहने से मन भ्रमित नहीं होता और उचित दिशा में प्रगति करते हुए अपने लक्ष्य पर जा पहॅुचता है । मनुष्य की असली प्रगति यही है, भौतिक जगत की संपदा और उपलब्धियों का महत्व इसके सामने तुच्छ है। इसका अर्थ यह है कि प्रगति आन्तरिक चीज है वाह्य जगत की चीज नहीं , असली प्रगति है जड़ से मन की ओर और मन से आत्मा की ओर चलते जाना। गति ‘‘आन्तरिक  आन्तरिक’’ हो तो वाह्य जगत के क्रिया कलाप  बाधक नहीं बनते , कुछ भी करो प्रगति होगी ही।
आधुनिक जीवविज्ञानी भी इस बात को मानते हैं कि यूनीसेल्युलर वाॅडी का विकास कमशः मल्टीसेल्युर वाॅडी की ओर होता है परन्तु यूनीसेल्युलर वाॅडी कैसे आकार लेती है वे यह नहीं जानते। वे कहते हैं कि पानी में वायु  और धूल के कण जब प्रकाश की उपस्थिति में सामान्य ताप और दाब पर संयोजित होते हैं तब एक कोशीय जीव अर्थात् यूनीसेल्युलर वाॅडी जिसे हम ‘‘काई’’ कहते हैं उत्पन्न होता है । इस प्रकार जहाॅं भौतिक विज्ञानी काॅस्मिक साइकिल, काॅस्मिक माइंड, स्पेस, टाइम और गुरुत्वाकर्षण के कारण को नहीं जानते वैसे ही जीववैज्ञानिक जीवों के उद्गम के कारण और अन्तिम रूप से उनकी प्रगति के बारे में कुछ भी कहने से डरते हैं। परन्तु इन सबका उत्तर हमें आध्यात्मिक विज्ञान में तर्क और विवेक का उपयोग करने पर मिल जाता है।

हमारा मन बहुत कुछ आधुनिक भौतिकी के ‘‘फोटान’’ कण की तरह अनेक दिशाओं में अपनी ऊर्जा को विकीर्णित करता रहता है इसलिए इस अवस्था में उससे कोई विशेष कठिन कार्य नहीं कराया जा सकता परन्तु जब फोटान की ऊर्जा को एक दैशिक अर्थात् ‘यूनीडायरेक्शनल’ बना दिया जाता है तो वही ‘‘लेसर’’ किरण बनकर शक्तिशाली हो जाता है। हमारा इष्ट मंत्र, मन की ऊर्जा को अनेक दिशाओं में विकिरित होने से रोक कर उसे एक दैशिक अर्थात् ‘यूनीडायरेक्शनल’ बनाता है जिससे उसकी ऊर्जा प्रभावी होकर लक्ष्य तक पहुँचा  देती है। मन की ऊर्जा को मन्त्र की सहायता से एक दैशिक बनाने का कार्य ही योगसाधना करना कहलाता है। योगविज्ञान में जिसे इष्ट मंत्र कहा जाता है , आधुनिक विज्ञान में उसे मूल आवृत्ति या ‘‘फंडामेंटल फ्रीक्वेसी ’’ कहते हैं। विज्ञान के अनुसार प्रत्येक पदार्थ अथवा जीव की अपनी अपनी मूल आवृत्ति होती है यही कारण है कि वे भिन्न भिन्न आकार प्रकार और स्वभाव के होते हैं। यदि किसी पदार्थ के संबंध में विस्तार से जानना है तो उसकी मूल आवृत्ति के साथ हमें अपनी मूल आवृत्ति का अनुनाद करना होता है। आधुनिक संचार विज्ञान इसी सिद्धान्त पर कार्य करती है; अन्तर केवल यह है कि वह उच्च और अति उच्च आवृत्तियों के क्षेत्र में क्रियाशील रहती है जबकि योगविज्ञान निम्न से निम्नतम आवृत्तियों के क्षेत्र में  सक्रिय रहती है। योगविज्ञान में भी मंत्राघात से उत्पन्न मूल आवृत्ति की तरंगें (आहत नाद ) परमसत्ता की मूल आवृत्ति (अनाहत नाद) जिसे ओंकार ध्वनि या प्रणव कहा जाता है, के साथ अनुनाद स्थापित करती हैं और परमात्मा की अनुभूति कराती हैं। इस प्रक्रिया के संचालन और प्रगति का मार्ग यद्यपि तेज छुरे की धार पर चलने जैसा कहा गया है परन्तु यदि इष्टमंत्र का साथ और लक्ष्य की दृढ़ता बनी रहती है तो यही सरल बन जाता है। ओंकार से अनुनादित होने से पूर्व मन अधिकाधिक ऊर्जावान होता जाता है इसकी विभिन्न अवस्थाएं सिद्धियों के नाम से जानी जाती हैं जिन्हें अनुभवी लोग त्याज्य मानते हैं और आनन्दातिरेक की अवस्थाओं को समाधियों का नाम दिया गया है। अनुभव सिद्ध योगियों का कहना है कि मनुष्य का लक्ष्य न तो सिद्धियाॅं और न ही समाधियाॅं होना चाहिए; उसका लक्ष्य तो केवल परमपुरुष को पाना ही होना चाहिए क्योंकि जिसका जो लक्ष्य होता है परमपुरुष की इच्छा से वैसा ही सब कुछ होता है।

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