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मोरे सईंया भये कोतवाल.. अब डर काहे का..


मोरे सईंया भये कोतवाल.. अब डर काहे का..

06 अगस्त 2010 के दिन मैं आगरा में था...
अचानक एक शानदार वाकया सामने आ गया जिसमें कानून के दो रखवाले किसी तीसरे के साथ ट्रिपल सवारी का आनंद ले रहे थे...
जिस मोटर-साईकल पर ये तीनों सवार थे उसका नंबर है - UP80-BJ - 0639

अब मेरा सवाल है कि जिन्हें कानून का प्रहरी बनाकर जनता से कानून पालित करवाने हेतु रखा गया है वे स्वयं जब नियम-कायदे तोड़ते नज़र आ जाएँ तो उसके लिए हमारे कानून में क्या प्रावधान है... और अगर उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही हो सकती है तो क्यूँ अधिकतर पुलिस वाले ही कानून तोड़ने में संलिप्त नज़र आते हैं.....?

व्यवस्था के रक्षक ही जब भक्षक बन जाएँ तो आम-जन पार कैसे पाए.....?

_____ जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 28-October-2010 )




Photography by :- Jogendra Singh
Place :- Agra ( near police lines ) ( 06-अगस्त-2010 )



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OBO के मंच पर एक सार्थक बहस का आगाज़ करने के लिए मैं आपको साधुवाद देता हूँ. यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि जिन पर रखवाली की ज़िम्मेदारी होती है, वही सेंध लगाते हैं.यहाँ मैं अपनी ही लिखी दो पंक्तियाँ उधृत करना चाहता हूँ-
जिसे करने में फ़रिश्ते भी शायद डरते हैं.
हम इंसान उसे दिल लगाकर करते हैं.
भाई जोगेंद्र जी, एक बार पुन: मैं आपको धन्यवाद देता हूँ.
सतीश जी ,,,
इस सरकारी बेहूदगी पर आपकी पंक्तियाँ बेहद खूबसूरत हैं ... धन्यवाद आपका ...
sundar post Jogi bhaiya .. kanoon ko aml e jama pehnaney valo kaa ye photo daal kar aap gustakhi kar rahey hai.. kanoon sidhe saadhe logo ke liye hai....takat ke liye nahi...
यो बात तो सही कह दी तुमने ► नूतन .....
ठीक है कानून सीधे लोगों के लिए है पर आवाज़ उठाना बंद तो नहीं कर सकते हैं ना......

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