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मुझको पता नहीं है, मैं कहाँ पे जा रही हूँ
तेरे नक़्श-ए-पा के पीछे,पीछे मैं आ रही हूँ

उल्फत का रोग है ये, कोई दवा ना इसकी
मैं चारागर को फिर भी,दुःखड़ा सुना रही हूँ

सुन के भी अनसुनी क्यूँ,करते हो तुम सदाएँ
फिर भी मैं देख तुमको यूँ मुस्कुरा रही हूँ

बेचैनियों का मुझ पर, आलम है ऐसा छाया
क्यो खो दिया है जिसको, पा कर ना पा रही हूँ

मुझे भूलना भी इतना ,आसाँ तो नहीं होगा
दिन रात होगें भारी, तुमको बता रही हूँ

ठहरो मैं संग चलूगीं ,मुश्किल हों कितनी राहें
हाथों में दिल के अरमाँ, मैं ले के आ रही हूँ

है भूख प्यास ग़ायब, फ़िर भी हूँ 'दीप' ज़िंदा
जाने क्या पी रही हूँ, जीती ही जा रही हूँ

- प्रदीप देवीशरण भट्ट -मौलिक व अप्रकाशित 05.12.2019

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Comment by Samar kabeer on December 9, 2019 at 5:17pm

जनाब प्रदीप जी आदाब,अच्छी रचना है,बधाई स्वीकार करें ।

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