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कैसे कहू मैं दिल की .....

कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .
ख्वाब अधुरा रह गया ,
ख्वाबो पे छुरी चल गई  ,
कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .
बालपन की मन में ब्यथा ,
तन सयानी हो गई ,
लोगो की नजरो में आना ,
जवानी दुश्मन हो गई 
कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .
अपने होते ख्वाबें होती ,
मन की मुरादें मिल जाती ,
अपनों ने जो दगा किया ,
जिगर ये छलनी कर गई ,
कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .

Views: 777

Comment

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Comment by Rash Bihari Ravi on July 12, 2011 at 1:13pm
dhanyabad sir
Comment by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on July 11, 2011 at 7:33pm
Bahut sundar
Comment by Rash Bihari Ravi on July 7, 2011 at 1:54pm
dhanyabad neelam ji lata ji ewam dat sahab
Comment by डॉ. नमन दत्त on July 5, 2011 at 7:45am
सुन्दर... सरल... सहज...सुगम्य गीत....साधुवाद.
Comment by Lata R.Ojha on July 5, 2011 at 12:21am
bahut khoob :)
Comment by Neelam Upadhyaya on July 4, 2011 at 3:56pm
Bahut badhiya.
Comment by Rash Bihari Ravi on July 4, 2011 at 11:54am
ashish ji ambarish ji prabha ji aur shashi ranjan ji aap logo ko bahut bahut dhanyabad
Comment by Shashi Ranjan Mishra on July 3, 2011 at 10:10pm

यार मत रख दिल मे दिल की बात
रोग होंगे कई, पक्षाघात-हृदयाघात :P

 

bahut badhiya guru ji.... badhayi

Comment by Prabha Khanna on July 3, 2011 at 12:38pm
रवि भाई... Very well said :)) Full of emotions...
Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 3, 2011 at 12:31pm
भाई रवि कुमार जी......... बहुत अच्छा प्रयास किया है आपने ..........बधाई .......
दिल की दिल में रह गयी, बिसरी अब तो याद.
अपनों से अब क्या गिला, सब कुछ जो बर्बाद..

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