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सौंपी थी जिसे चाबी खुद्दार समझकर
सारा सामान लेकर चाबी वो दे गया
करता रहा भरोसा ताउम्र उसी पर
गुस्ताख़ की शक्ल भी धुँधला वो कर गया.
मायूस न हो ज़िंदगी बस थोड़ा सब्र कर
उसका ही था ये मान न वो तेरा ले गया.
ख़ुदा ने दी है रहमत आख़िर किसलिए
अपना तू रख ईमान क्या बसेरा ले गया!

(मौलिक और अप्रकाशित) 

 - जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर 

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 12, 2019 at 10:36pm

सार्थक और समीक्षात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब! मैं भी संतुष्ट तो नहीं था. पर भाव जो मन में थे उसे ही लिख दिया. सादर!

Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 2:26pm

जनाब जवाहर लाल सिंह जी,रचना अभी समय चाहती है ।

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