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टूटने का दर्द होता एक समान ...........रिश्ता नामवर हो या के अनाम

चुभन तो मिट जाती है हर शूल की....शालती राहती उम्र तमाम....

घाव तो भर जाते है हर चोट के.... रह जाते है मगर निशान....

बेवफ़ाई तो भूल चुके उनकी मगर....भूल ना सके उनके अहसान

कद्र वो क्या समझते हमारी वफा का...जफ़ाओ का जो रखते सामान

क़ातिल तो फकत क़ातिल होता है...उसका न कोई धर्म न ईमान

                                              ##### प्रदीप सिंह चौहान "अनाम"

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Comment by Shanno Aggarwal on June 21, 2011 at 5:28pm

बहुत खूब ! 

''घाव तो भर जाते है हर चोट के.... रह जाते है मगर निशान....

बेवफ़ाई तो भूल चुके उनकी मगर....भूल ना सके उनके अहसान''

कृपया ध्यान दे...

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