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ग़ज़ल नूर की-मैं पहले-पहल शौक़ से लाया गया दिल में

22 11 22 11 22 11 22
.
मैं पहले-पहल शौक़ से लाया गया दिल में
फ़िर नाज़ से कुछ रोज़ बसाया गया दिल में.
.
वो ख़त तो बहुत बाद में शोलों का हुआ था,
तिल तिल के उसे पहले जलाया गया दिल में.
.
हालाँकि मुहब्बत वो मुकम्मल न हो पाई 
शिद्दत से बहुत जिस को निभाया गया दिल में.
.
अंजाम पता है हमें कुछ और है फिर भी,  
हीरो को हिरोइन से मिलाया गया दिल में.   
.
हम सच में तेरी राह में कलियाँ क्या बिछाते
पलकों को मगर सच में बिछाया गया दिल में.  
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by गिरिराज भंडारी on May 17, 2017 at 7:32am

आदरणीय नीलेश भाई , गज़ल अच्छी हुई है ... बधाइयाँ स्वीकार करें .. पर हाँ , वैसी नही हो पायी जैसी आप कहते हैं वहीं ये बात भी सही है कि सभी उँगलियाँ एक सी नही होतीं ।

Comment by Mohammed Arif on May 17, 2017 at 12:12am
अंजाम का पता है हमें कुछ है फिर भी ,
हीरो को हिरोइन से मिलाया गया दिल मेंं । वाह!वाह!! मॉडर्न अंदाज़ का शे'र हुआ है । ऐसे ही शे'रों की इस मंच को ज़रूरत है ।
शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें आदरणीय नीलेश जी ।

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