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ओबीओ की सातवीं सालगिरह का तोहफ़ा

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
(एक शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ कर दें)


जो कहूँ जो लिखूँ ओबीओ के लिये
यूँ समर्पित रहूँ ओबीओ के लिये

माँगता हूँ यही आजकल मैं दुआ
जब तलक भी जियूँ ओबीओ के लिये

वक़्त इसके लिये कुछ निकालो ज़रा
ये गुज़ारिश करूँ ओबीओ के लिये

दूसरा काम कोई नहीं है मुझे
जब रुकूँ ,जब चलूँ ओबीओ के लिये

आप आऐं हमारे परिवार में
जो मिले ये कहूँ ओबीओ के लिये

अब ग़ज़ल या कथा ही नहीं दोस्तो
छन्द भी मैं लिखूँ ओबीओ के लिये

ज़िक्र इसका रहे हर ज़बाँ पर "समर"
काम ऐसे करूँ ओबीओ के लिये

समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on April 20, 2017 at 2:51pm
जी हां,सही फ़रमाया आपने,मुझे लिखना था कि 'इस मिसरे की तक़्ति मैंने उर्दू के हिसाब से की है',ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया आपका ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 19, 2017 at 11:37pm

आदरणीय समर साहब , आपने जो कहा या तक्तीह की, व्पो तो मैं समझ ही रहा हूँ. मुझे परेशानी इसवाक्य जो लेकर है... //'परिवार'शब्द की तक़ती मैंने उर्दू के लिहाज़ से 212 की है//

यहाँ परिवार को २१२ में कैसे या कहाँ बाँधा गया है. मैं समझता हूँ यह टंकण त्रुटि है. 

शुभ-शुभ

Comment by Samar kabeer on April 19, 2017 at 6:02pm
निलेश जी,मिसरे तो मैं ख़ुद बदल सकता हूँ,लेकिन ये ग़ज़ल मैंने ओबीओ की सालगिरह वाले दिन ही कही थी,इसलिये उस वक़्त 'परिवार'शब्द पर ध्यान नहीं गया था,क्योंकि उर्दू के हिसाब से मिसरा बिल्कुल दुरुस्त है, बाद में ख़याल आया तो ये नोट लगा दिया,और मंच के लोगों ने इसे समझ भी लिया था,इसे उसी वक़्त दुरुस्त इसलिये नहीं किया था कि जनाब योगराज प्रभाकर साहिब ने बड़ी मुहब्बत से इसे सात रंगों में रंगा था,और फ़ौरन इसे दुरुस्त करने के लिये कहकर में उन्हें ज़हमत नहीं देना चाहता था,सोचा था ये जब पुरानी हो जायेगी तब ये मिसरा तब्दील कर दूँगा,अब देखता हूँ कि क्या हो सकता है,आपका सुझाया गया मिसरा। भी ख़ूब है, शुक्रिया आपका ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 19, 2017 at 5:22pm

मैं बीच में कुछ कहूँ इतना ज्ञान नहीं है मुझे लेकिन बहस न खिंचे इसलिए यदि 
एक परिवार है आइये आप भी 
किया जा सकता हो तो देखियेगा  सर 
.
सादर 

Comment by Samar kabeer on April 19, 2017 at 3:23pm
जनाब सौरभ पाण्डेय जी आदाब,
आमीन,सुम्मा आमीन ।
जी इस तरह:-
आप आ/212
एं हमा/212
रे परी/212
वार में/212
ये चूँकि जज़्बाती ग़ज़ल है इसलिये ये नोट लगा दिया था ,बिला वजह की बहस से बचने के लिये ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 19, 2017 at 12:38pm

मुबारकां हुज़ूर मुबारकां .. 

आपकी दिली ख़्वाहिशें पूरी हों. 

//'परिवार'शब्द की तक़ती मैंने उर्दू के लिहाज़ से 212 की है//

इस पंक्ति पर रोशनी डालें आदरणीय. सीखने-सिखाने का नज़रिया बना रहे.

सादर 

Comment by Samar kabeer on April 5, 2017 at 6:06pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,

तुम कहो में कहूँ, ओबीओ के लिये
संग सबके चलूँ ,ओबीओ के लिये ।
ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on April 5, 2017 at 5:59pm
जनाब बृजेश कुमार'ब्रज'साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on April 5, 2017 at 5:57pm
जनाब रवि शुक्ल जी आदाब,ये ओबीओ को समर्पित मेरी चौथी ग़ज़ल है, पहली पांचवीं सालगिरह पर दूसरी छटी सालगिरह पर,उसके बाद वो ग़ज़ल जिसका आपने ज़िक्र किया,और अब ये ग़ज़ल ।
ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सर्थक हुआ,सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ,ओबीओ ज़िंदाबाद ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 5, 2017 at 5:57pm

संग तेरे रहूँ .. ओ बी ओ के लिये

तू कहे , मै कहूँ .. ओ बी ओ के लिये
आदरणीय समर भाई , एक बार फिर ओ बी ओ के प्रेम मे पगी  आपकी  बेहतरीन गज़ल पढ़्ने मिली , आपकी सद्भावनाओं को नमन एवँ गज़ल के लिये आपको हृदय तल से बधाइयाँ प्रेषित हैं ... स्वीकार कीजिये ।

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