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ज़िन्दगी से जो मिला, अच्छा मिला (ग़ज़ल)

2122 2122 212

नेक-नीयत रख के आखिर क्या मिला
हर कदम पर हाँ मगर धोखा मिला

कौन दुश्मन,किसको कहते खैरख्वाह
हर कोई क़ातिल से मेरे था मिला

मांगने वालों की झोली ना भरी
जिसने ना माँगा उसे ज़्यादा मिला

यूं लगा कोई खज़ाना मिल गया
बीस पैसे का जब इक सिक्का मिला

बेवफ़ाई, बेबसी, ग़म, शाइरी
ज़िन्दगी से जो मिला अच्छा मिला
========================

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on May 1, 2016 at 12:54pm
स्पष्ट करने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद,आदरणीय!

कृपया इस पर विचार करें-

कौन दुश्मन, किसको समझूँ खैरख्वाह
हर कोई क़ातिल से मेरे जा मिला..

आपकी इस्लाह की प्रतीक्षा में हूँ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 1, 2016 at 12:47pm

कहते प्रयुक्त हुआ है "हम कहते" के सन्दर्भ में ..
नीचे हमारे न हो कर मेरे आ गया सो ऊपर "कहता यानी मैं कहता" आना चाहिए ..
यही शतुर्गुरबा है ....जैसे कचौरी के साथ बिस्कुट :)) 

Comment by जयनित कुमार मेहता on May 1, 2016 at 12:42pm
आदरणीय नीलेश जी, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सुझावों से बहुत प्रसन्न हूँ।

मैं आपकी बात का ध्यान रखूँगा।
पर, मुझे शतुर्गुरबा दोष समझ में नहीं आ रहा है।
कृपया स्पष्ट कर सकें तो बड़ी कृपा होगी।
सादर!!
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 1, 2016 at 12:10pm

बहुत खूब जयनीत भाई ...एक दो सुझाव हैं ..

हर कदम पर हाँ मगर धोखा मिला.... हाँ मगर थोड़ा सा ऑफ बीट लग रहा है सानी मिसरे के साथ..दोषपूर्ण नहीं है लेकिन बदला जा सके तो बेहतर होगा.
.
कौन दुश्मन,किसको कहते खैरख्वाह
हर कोई क़ातिल से मेरे था मिला.... कहते के साथ मेरे से शतुर्गुरबा ऐब हो रहा है ..यूँ कर लें 

किस को दुश्मन,खैरख्वाह किस को कहूँ 
हर कोई क़ातिल से मेरे जा मिला
.
अप तौर पर नहीं के लिए  "ना" के प्रयोग से बचना चाहिए .."न" सही लगता है .. 
मांगने वालों की झोली "तो" भरी
जिसने "कम" माँगा उसे ज़्यादा मिला..
.
यूं लगा कोई खज़ाना मिल गया
बीस पैसे का जब इक सिक्का मिला... यहाँ दोनों मिसरे एक सामान स्वर पर समाप्त होने से ताक़ाबुल-ए-रादीफ़ नामक दोष है ..कोई इसे मानता है, कोई नहीं... ठीक हो सकता है तो किया जाना चाहिए ..
अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई  

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