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22 122 22 122
जबसे हैं तुमसे, उलझीं निगाहें।
इक दूसरे में, डूबीं निगाहें।।

मौका लबों को देती नहीं हैं।
बातें करें खुद, अपनीं निगाहें।।

दुनिया की कोई परवा नहीं है।
मिलकर झपकना, भूलीं निगाहें।।

जब भी हुई हैं, तुमसे जुदा ये।
तूफ़ाँ उठा औ' बरसीं निगाहें।।

अब छोड़कर के, जाना नहीं तुम।
बस ये ही तुमसे, कहतीं निगाहें।।

मौलिक-अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 12, 2016 at 1:48pm
आदरणीय राजेश दीदी सादर प्रणाम्

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 12, 2016 at 10:04am

बहुत खूब ...हार्दिक बधाई 

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