For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")


बिहार प्रान्त एवं उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र से चल कर पूरे भारत में प्रसिद्ध होने वाले इस पर्व को महापर्व का क्यों  जाता है, इसका पता आपको इस व्रत की पूजा पद्वति से पता चल जायेगा। छठ पर्व छठ, षष्टी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसीय  व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया।

लोक-परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मइयाका संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद राम-राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य की यही पद्धति प्रचलित है। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा सूर्य की पूजा करने का भी उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। उसकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया था। एक अन्य कथा के अनुसार राजा प्रियंवद की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि "सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो।"  राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी प्रारम्भ होने वाले इस पर्व का प्रथम दिन लौकी-भात (बिहार के कुछ क्षेत्र में नहाय-खाय) होता है। इस पूजा दिन से यह व्रत पारम्भ हो जाता है और सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्च की आराधना के साथ खत्म होता है। उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे रात बिताता है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। ‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। किंतु पुरुष भी यह व्रत पूरी निष्ठा से रखते हैं।

छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिंदू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है

-:पहला दिन :-
 
व्रत का पहला दिन लौका-भात या लौकी-भात का होता है। व्रती सुबह उठकर पूजन इत्यादि कर लौकी की सब्जी, चना की दाल एंव चावल खाते है।  जब तक व्रत करने वाला भोजन नहीं कर लेता इस दिन परिवार का कोई सदस्य भोजन नही करता। व्रती के भोजन के बाद गेहूँ एवं अन्य प्रसाद बनाये जाने वाले अन्न को धो कर धूप में सुखाया जाता है। आज का भोजन परम्परा के अनुसार आम की लकड़ी पर बनता है। अब कई घरो में आम की लकड़ी के आभाव में गैस चुल्हे की सफाई कर भोजन बनाने की प्रथा शुरू हो गई है।

-: दूसरा दिन:-

आज का दिन खरना के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सुबह से व्रती निरजला व्रत रखते हैं और रात को केले के पत्ते पर, परिवार के सदस्यो की संख्या के हिसाब से पूड़ी, गुड की बनी खीर, ठेकुआ और फल रख कर छठ माँ की आराधना करते हैं। आराधना के उपरान्त चढ़ाई हुई पूरी और खीर खुद खाती हैं। व्रती के भोजन के दौरान कोई भी जाने-अंजाने व्रती का नाम लेकर पुकारता है और व्रती के कानो में अगर वह आवाज चली गयी तो व्रत उसी समय भोजन करना छोड देगी चाहे वह एक निवाला भी नही खाया हो । और इसके बाद परिवार के सभी सदस्य उस पूजन स्थल पर सिर नवा कर प्रसाद ग्रहण करते है। इस प्रकार पर्व का दूसरा दिन खराना पूरा हो जाता है।

-: छठा दिन:-

आज का दिन अद्भूत होता है। सुबह से ही प्रसाद खरीदने वालो की भीड़ बाजारों में दिखाई देने लगती है। बाजार में चारो तरफ फल-फूल, गन्ना, दउरा, कोशी इत्यादि दिखाई देते हैं। घरों के अन्दर महिलाओं द्वारा प्रसाद के रूप में ठेकुआ इत्यादि आम की लकड़ी जला कर चूल्हे पर बनाया जाता है। दोपहर होते ही सारा प्रसाद एक दउरे या बाँस की ढाल में रख कर कर उसे साफ कपड़े से बाँधने का कार्य शुरू हो जाता है। लगभग तीन बजे घर की महिलायें व्रती को साथ लेकर गंगा या किसी अन्य जलाशय की तरफ प्रस्थान कर जाती है। छठ के पराम्परिक गीत गाते हुए गंगा घाट पर जाती औरतें, घर से नंगे पावों सिर पर डाल और दऊरा उठाये गंगा घाट जाते युवक, सोलह शृंगार में सजी हुई नव-विवाहिताये होतीहैं। हर तरफ मंत्र-मुग्ध कर देने वाला वातावरण होता है। सूर्य देव के क्षितिज की राह पकड़ते ही व्रती गंगा या जलाशय में खड़े होकर कठिन अराधना के साथ दूध का अर्घ्य देना शुरू कर देते हैं। जिसके घर में जितने पुरूष होते है सूपो की संख्या उतनी ही होती है। हर सूप को गंगा के पानी से सटा कर उस पर दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इस पूजा के बाद गंगा घाट पर आज की पूजा सम्पन्न हो जाती है। सभी अपने अपने घर को चले जाते है । जिन परिवारो में पूरे साल कुछ भी शुभ हुआ रहता है वह परिवार आज शाम को कोसी भरते है।

कोषी भरने की रस्म
 
अगर परिवार में कोई शुभ काम, शादी-विवाह, वंश वृद्धि हुई है तो रात में कम से कम 5 औरतें मिल कर घर के आगँन में छठ मईया के गीत गाते हुये पाँचों खोइछा (एक कपड़े में हल्दी, दूभ, कुछ पैसे, कुछ फल रख कर बाँध दिया जाता है) बँधे हुए गन्ने आपस में जोड कर  कर खड़े कर दिये जाते है। खड़े गन्ने की बीच की जगह में  कोषी में दीप प्रज्जवलित कर फल-प्रसाद रख दिया जाता है। जिससे कोषी भरना कहा जाता है। इस कोषी केा सुबह फल फूल सहित गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।

-:सातवां और अंतिम दिन:-
    
छठ पूजा का सातवां और अंतिम दिन काफी सुहावना होता है। सुबह तड़के परिवार के सदस्य स्नान-ध्यान करके डाल-दउरा उठा कर घाट की तरफ चल देते हैं। आज का दिन विशेष कर बच्चों के लिए खुशियो का दिन होता है। घर में बन रहे पकवानो, प्रसादो एवं रखे फल-फूल जिस पर उनकी नज़रे रहती थी, जिसे वह छू भी नहीं सकते थे,आज वह उसे खा सकेगें। व्रती एवं उसके परिवार की अन्य महिलाएं पारम्परिक गीत खाते हुए गंगा घाट पर पहुँचती हैै। सूर्य देव के उदय के समय व्रती गंगा के पानी में खडे़ हेाकर सूर्य की उपासना करते हैं।। सूर्य उदय के बाद दूध उनको अर्घ्य देते हैं। नदी के किनारे ही हवन पूजन कर के व्रत समाप्त करते है। सुबह के पूजन के उपरान्त बच्चे ही नहीं बड़े लोग भी घाट पर घूम कर सबसे प्रसाद माँग कर खाते हुए देखे जाते है। घर आकर व्रती कोषी भरने वाली औरतो केा प्रसाद देती है। और उसके बाद भेाजन कर व्रत खत्म करती है। उसके बाद यह महापर्व समाप्त हो जात है।


छठ पूजा की कुछ विशेष बातें --
गेहूँ चावल या अन्य कोई सामाग्री धोने से पूर्व स्नान कर साफ कपड़े पहनना जरूरी होता है।
गेहूँ या अन्य कुछ भी सुखवाते समय ध्यान रखना चाहिए कि उसे कोई जूठा न करें यहाॅं तक की पशु-पक्षी भी नहीं।
खरना व्रत के दिन रात को व्रती के भोजन के समय किसी प्रकार की आवाज न हो इस का ध्यान रखना चाहिए।
पूजा के पहले अर्घ्य के दिन जो डाल में जो प्रसाद जलाशय पर जाता है, उसे सुबह के अर्घ्य पर नहीं ले जाना चाहिए । डाल और सूप के सारे प्रसाद बदल कर नये रख देने चाहिए।
सूप पर प्रयास यह करें कि अर्घ्य देते समय दीपक जलता रहे।
प्रसाद यथाशक्ति ही चढायें, पूजा प्रसाद से नहीं भाव से होती है।
सूपो की संख्या परिवार के पुरूष सदस्यो के संख्या के बराबर होती है।
अगर उस साल परिवार में कोई मौत होती है तो छठ का व्रत नहीं किया जायेगा। परन्तु अगर व्रती चाहे तो वह अपने माइके, या किसी अन्य परिजन के घर जाकर छठ व्रत कर सकती है।

**********************************************

पराम्‍परिक कथा पर आधारित 

अखंड गहमरी

Views: 899

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 17, 2015 at 9:59am

कार्तिक मॉस के दी[ओत्सव उत्सवों के बाद छठ यानी षष्ठी का व्रत का महा पर्व और  गोपास्थ्मी पर्व महत्वपूर्ण है | सूर्य वंशी प्रभु राम द्वारा दसहरा विजय के बाद अयोध्या में दीपावली पर रौशनी और फिर राम राज्य की स्थापना से पूर्व कार्तिक शुक्ल षष्टि को सूर्य की आराधना करने सप्तमी का अनुष्ठान पूर्ण कर अष्टमी को गौपूजा  करने की मान्यता प्रचलित है | विस्तार से आलेख प्रस्तुत कर जानकारी कराने के लिए हार्दिक धन्यवाद आपका  श्री  अक्शंद गहमरी जी | छठ मैया को नमन 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 16, 2015 at 12:00am

छठ यानी षष्ठी का व्रत वस्तुतः एक महापर्व है. इसका वैधानिक और नियमगत परिपालन अगाध श्रद्धा के बिना संभव ही नहीं. 

आपने बहुत ही इत्मिनान से आलेख को प्रस्तुत किया है, अखण्ड भाई. 

हार्दिक धन्यवाद तथा छठ मइया हमसभी बनाये रखें.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on November 15, 2015 at 9:34pm

बहुत ही सुन्दर विवरण युक्त प्रस्तुति के लिए आपका अभिनंदन! छठ व्रत  श्रद्धा और बिश्वास का पर्व है. पवित्रता का पूर्ण ख्याल रक्खा जाता है. प्रसाद के रूप में, किसान के घर में जो भी होता है, उसे ही उपयोग में लाया जाता है. बिना ब्राह्मण के यह स्वत: की जानेवाली आराधना है. अब तो इस पर्व को विदेशों में भी, जहाँ बिहारी समुदाय के लोग रहते हैं, मनाया जाने लगा है. सफाई, सुथराई,  पवित्रता और श्रद्धा प्रधान है. बाकी यथा शक्ति तथा भक्ति…  सादर सूर्य भगवान हम सबका कल्याण करें!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service