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ग़ज़ल- छिपे मक्कार हैं बहुत (गिरिराज भंडारी)

221    2121    1221      212

शब्दों की ओट में छिपे मक्कार हैं बहुत  

बाक़ी, अना को बेच के लाचार हैं बहुत

 

किसने कहा कि बज़्म में रहना है आपको

जायें ! रहें जहाँ पे तलबगार हैं बहुत

 

अपनी भी महफिलों की कमी मानता हूँ मैं

है फर्ज़ में कमी, दिये अधिकार हैं बहुत

 

समझें नहीं, कि अस्लहे सारे ख़तम हुये

अस्लाह ख़ाने में मेरे हथियार हैं बहुत

 

नफरत जता के हमसे, जो दुश्मन से जा मिले

वे भी मुहब्बतों के क्यूँ हक़दार हैं बहुत

 

धो लीजिये हुज़ूर हथेली कहीं से आप

ज़ह्नों के साथ, हाथ गुनहगार हैं बहुत    

 

निकलेगा सूर्य तो ये भरम टूट जायेगा

गो रोशनी के सामने दीवार हैं बहुत 

**************************************

 मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 8, 2015 at 9:52am

आदरणीय मनन कुमार भाई , ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 8, 2015 at 9:51am

आदरणीया प्राची जी , हौसल अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 8, 2015 at 9:50am

आदरणीय मोहन बेगोवाल भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हृदय से आभार ।

Comment by Manan Kumar singh on November 7, 2015 at 11:38pm
बहुत बढ़िया गजल कही है गिरिराज भाई जी आपने,बधाई लीजिये।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 7, 2015 at 11:33pm

बहुत शानदार अशआर कहे हैं आ० गिरिराज भंडारी जी 

बहुत बहुत बधाई

Comment by मोहन बेगोवाल on November 6, 2015 at 7:57pm

        आदरनीय गिरि राज जी, इस बाकमाल ग़ज़ल कि लिए बहुत बहुत बधाई ये शे'र बहुत ही उम्दा

निकलेगा सूर्य तो ये भरम टूट जायेगा
गो रोशनी के सामने दीवार हैं बहुत


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 6, 2015 at 11:30am

आदरणीय लक्ष्मण भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 6, 2015 at 10:48am

बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल हुई है ..आ० भाई गिरिराज जी हार्दिक बधाई l


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 6, 2015 at 10:18am

आदरनीय पंकज भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 6, 2015 at 9:36am
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल के लिए सादर अभिवादन

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