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नजरें दीवारों पर क्यों। " अज्ञात "

बेकार हजारों कोशिश भी,                         

इन आँखों को समझाने की ,                    

रखती हैं समुंदर को वश में,                   

और धार बहाये रहती हैं।

                       
जबकि है मालूम इन्हें,                                     

वो दूर हैं नजरों से फिर भी,                   

नजरें दीवारों पर क्यों,                                   

टकटकी लगाये रहती हैं।

                     
है असर मुहब्बत का इतना,                 

दिल सोचे कुछ, होता कुछ है,              

सोना चाहे यादों के संग,                       

तो यादें जगाये रहती हैं।

                      
शायद इनका भी दोष नहीं,                  

जब से नजरें चार हुई ,                              

उनकी बातें, उनकी यादें,                                        

धड़कन में समाये रहती हैं ।

                 
अजय शर्मा  " अज्ञात  "

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Abid ali mansoori on November 4, 2015 at 8:20pm

वधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 4, 2015 at 11:31am

आदरणीय अजय जी इस प्रस्तुति पर बधाई एवं शुभकामनायें 

कृपया ध्यान दे...

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