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दोष आरक्षण के अब तो -(गजल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    2122    212
*********************************
बारिशों के  हादसे  जब  दामनों  तक आ गए
दुख मेरी तन्हाइयों की बस्तियों तक आ गए /1

याद  मुझको   तो  नहीं  हैं  ठोकरें मैंने भी दी
क्यों ये पत्थर रास्तों के मंजिलों तक आ गए /2

सोचकर निकले थे  बाहर  कुछ  उजाला ढूँढ लें
घर के तम लेकिन हमारे  रास्तों तक आ गए /3

नाव  जर्जर  और  पतवारें   रहीं   सब  अनमनी
क्या बताएं किस तरह हम साहिलों तक आ गए /4

हो रही है माँग हर शू जाति  क्या औ धर्म क्या
दोष आरक्षण के अब तो काबिलों तक आ गए /5

व्यक्तिवादी  सोच  बोलूँ या समाजों की चिता
हाथ मासूमों  के  अब जो बोतलों तक आ गए /6

वो रहे महफूज मिलना  छोड़ लिक्खी चिट्ठियाँ
कातिलों के हाथ लेकिन चिट्ठियों तक आ गए /7
************
(मौलिक और अप्रकाशित )

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 6, 2015 at 10:42am

आ० भाई मन जी ग़ज़ल की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 6, 2015 at 10:41am

आ० भाई आबिद अली जी उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 6, 2015 at 10:40am

आ० कान्ता बहन ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार l

Comment by Manan Kumar singh on November 5, 2015 at 8:33am
बहुत बढ़िया
Comment by Abid ali mansoori on November 4, 2015 at 8:34pm

याद  मुझको   तो  नहीं  हैं  ठोकरें मैंने भी दी
क्यों ये पत्थर रास्तों के मंजिलों तक आ गए!

वाह क्या बात है आदरणीय, वधाई आपको!

Comment by kanta roy on November 4, 2015 at 12:07pm

सोचकर निकले थे बाहर कुछ उजाला ढूँढ लें
घर के तम लेकिन हमारे रास्तों तक आ गए----वाह !!! बहुत खूब कही है आपने जितनी भी कही है। इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई आपको आदरणीय लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 4, 2015 at 11:20am


आ0 भाई मनोज जी , गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 4, 2015 at 11:20am


आ0 भाई पंकज जी , उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 4, 2015 at 11:20am

आ0 भाई गिरिराज जी, आपको गजल अच्छी लगी , लेखन सफल हुआ । त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 4, 2015 at 11:20am

आ0 भाई मिथिलेश जी , गजल की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

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