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तभी हुई है ग़ज़ल ( इस्लाह के लिये)

म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन
1212 1122 1212 112

सजल नयन से नदी उतरी तो हुई है ग़ज़ल।
जो पीर वाली फसल निखरी तो हुई है ग़ज़ल।।

न पूछो मिलती किधर हमको जी प्रेरणा ये कहाँ ।
हंसी प्रियम के अधर बिखरी तो हुई है ग़ज़ल।।

कभी कहीं जो सुवासित हवायें बहनें लगी।
जो रूपसी कहीं सव्री तो हुई है ग़ज़ल।।

कोई पथिक जो चला जीवन की इस कठिन सी डगर।।
किसी के सिर पे पड़ी गठरी तो हुई है ग़ज़ल।।

कहीं पे रिश्ता जो नाता है भंग होता कभी।
जो कोष लूटे कहीं प्रहरी तो हुई है ग़ज़ल।।

जहाँ तनिक भी हाँ अंतर कहीं बचा ही नहीं।
जो राम जी से मिली सबरी तभी तो है ग़ज़ल।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 27, 2015 at 3:27pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय जयनीत जी
Comment by जयनित कुमार मेहता on September 27, 2015 at 2:05pm
वाह! सुन्दर रचना..
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 26, 2015 at 12:47pm

सादर आभार आदरणीय श्याम नारायण जी

Comment by Shyam Narain Verma on September 26, 2015 at 12:00pm
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।

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