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12112 12112 12112 12112
पलट के फिर आयेंगी वो महक सबा वो सहर कभी न कभी
उदास न हो कि होगा हर इक दुआ का असर कभी न कभी

ये राह बहुत तवील सही, तू तन्हा ओ बेक़रार सही
मगर तुझे याद आयेगी ये घड़ी ये सफ़र कभी न कभी

यूँ हाथ के आबलों पे न जा, ज़बीं से टपकती बूंदें न देख
दिखेगा ज़रूर दुनिया को भी, तेरा ये हुनर कभी न कभी

पिघलने लगेंगे संगे-महक, तेरे तबो-ताब से किसी दिन
निकाल के लायेंगे यही पत्थरों से नहर कभी न कभी

फ़लक़ ये ज़मीन आबो हवा, किसी की ये मिल्कियत तो नहीं
यक़ीं है मुझे कि आयेगा सच सभी को नज़र कभी न कभी

(संगे महक= कसौटी का पत्थर)

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by शिज्जु "शकूर" on September 24, 2015 at 6:30am
आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

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Comment by शिज्जु "शकूर" on September 24, 2015 at 6:29am
आदरणीय मिथिलेश जी आपने सही कहा ये इस बह्र में मेरी दूसरी ग़ज़ल है पिछली ग़ज़ल से पहले मैंने इस ग़ज़ल को शुरू किया था पर ये मुकम्मल बाद में हुआ। मैं सिर्फ़ बह्र निभाने की कोशिश करता हूँ यहाँ भी मैंने यही किया है।

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Comment by शिज्जु "शकूर" on September 24, 2015 at 6:24am
आदरणीय कृष्ण मिश्रा जी आपका हार्दिक आभार।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 23, 2015 at 8:22pm

आ० शिज्जू जी  वाह  इस कठिन बह्र को कितना  अच्छा निभाया -- बिलकुल उस्तादों जैसी शायरी . मैं  तो कायल हो गया हूँ . सादर


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Comment by मिथिलेश वामनकर on September 22, 2015 at 10:10pm

आदरणीय शिज्जु भाई जी इस बह्र में शायद ये दूसरी ग़ज़ल है आपकी. इसकी लय पकड़ आई हो या कोई ग़ज़ल किसी ने गाई हो तो जुरूर बताइयेगा. सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on September 22, 2015 at 10:01pm
लाजव़ाब लाजव़ाब! क्या कहने आ० शिज्जू सर जिंदाबाद गज़ल हुयी है..हर शेर मुक़म्मल..उस्ताद स्तर का!तहेदिल से दाद ही दाद पेश है! सादर!

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Comment by शिज्जु "शकूर" on September 22, 2015 at 9:33pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय मिथिलेशजी

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Comment by मिथिलेश वामनकर on September 22, 2015 at 3:32pm

आदरणीय शिज्जु भाई जी, बह्र-ए-वाफिर में बढ़िया ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं. 

इस बह्र की लय नहीं पकड़ पाया हूँ इसलिए मैंने भी आदरणीय रवि जी जैसे इसके कथ्‍य का लुत्‍फ उठाया है. सादर 


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Comment by शिज्जु "शकूर" on September 22, 2015 at 3:26pm
आदरणीय रवि शुक्लाजी हार्दिक आभार, ये सात मूल बह्रों में से एक बह्रे वाफ़िर है

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Comment by शिज्जु "शकूर" on September 22, 2015 at 3:24pm
आदरणीय मनोजजी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

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