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आज हमें होश में आने का नहीं -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

2122-- 1122 --1122 --112

 

इस तरह आज हमें होश में आने का नहीं

मुफ्त आई है मगर यार पिलाने का नहीं

 

सिर्फ रोता हुआ हर गीत सुनाने का नहीं

जिंदगी नाम है जीने का, चलाने का नहीं

 

तुमको मंगता है उजाला तो सितारों से कहो

रौशनी को, मेरे घर आग लगाने का नहीं

 

देख बिगड़ी हुई सूरत को, कहा दरपन ने

फिर कभी भीड़ में यूँ आँख दबाने का नहीं

 

यार गुस्से से पिघल जाए तो ये अच्छा है  

आँसुओं से कभी ये जुल्म गलाने का नहीं 

 

तुमको सक्सेस जो होने का तो कुछ काम करो

सिर्फ अल्लाह से इक आस लगाने का नहीं

 

गंध हो जिसमें किसी के लहू की फैली हुई

ऐसी दौलत को कभी हाथ लगाने का नहीं

 

आज बेटी ने दिया आसरा तो मैं समझा

सिर्फ बेटों के लिए हाथ उठाने का नहीं

 

फैसला आज मेरे प्यार का ऐसे होगा

आज जाने का नहीं या कभी आने का नहीं

 

मेरा सपना था इसी प्लॉट पे घर करने का

सारी दुनिया से अलग गाँव बसाने का नहीं

 

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on September 21, 2015 at 4:36pm

सुंदर भावों की सुंदर गजल   … हार्दिक बधाई आदरणीय

सादर

Comment by Sushil Sarna on September 21, 2015 at 1:54pm



तुमको मंगता है उजाला तो सितारों से कहो
रौशनी को, मेरे घर आग लगाने का नहीं

गंध हो जिसमें किसी के लहू की फैली हुई
ऐसी दौलत को कभी हाथ लगाने का नहीं

आज बेटी ने दिया आसरा तो मैं समझा
सिर्फ बेटों के लिए हाथ उठाने का नहीं


मेरा सपना था इसी प्लॉट पे घर करने का
सारी दुनिया से अलग गाँव बसाने का नहीं

वाह आदरणीय मिथिलेश भाई साहिब वाह .... बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने खासकर ये अशआर तो दिल को छूते हैं। इस दिलकश पेशकश पर दिल से दाद कबूल फरमाएं आदरणीय।

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