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किस तरह नादानियों में हम मुहब्बत कर गए

2122 2122 2122 212


किस तरह नादानियों में हम मुहब्बत कर गए,
दी सजा दुनियां ने हमको सारे अरमां मर गए |

कब तलक खारिज ये होगी हक परस्तों की ज़मीं,
महके गुलशन तो समझना कातिलों के सर गए |

बंदिशें अब बेटियों पर, आसमां को छू रहीं,
किस तरह बदला ज़माना, बरसों पीछे घर गए |

प्यार की, हर पाँव से, अब बेड़ियाँ कटने लगीं,
नफरतों में, जुल्फों से, अब फूल सारे झर गए |

लुट रही अस्मत चमन की, कागज़ी घोड़े यहाँ,
और फिर हाले-वतन भी, बद से बदतर कर गए |






"मौलिक व अप्रकाशित" © हर्ष महाजन

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Comment

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Comment by विनय कुमार on August 1, 2015 at 4:58pm

वाह , बहुत खूबसूरत ग़ज़ल आदरणीय हर्ष महाजन जी । आदरणीय मिथिलेश जी का सुझाव भी खूबसूरती बढ़ा रहा है ग़ज़ल की , दिली बधाई..

Comment by मनोज अहसास on August 1, 2015 at 4:56pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल
बहुत गहरा बयान
सर
बस दूसरे और तीसरे शेर को आप थोडा समझा दे
समझ नहीं आ रहा
कृपिया अन्यथा न ले
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 4:45pm

दाद दिल से दे रहे है इस ग़ज़ल को, लीजिये

आपके अशआर पढ़कर 'हर्ष' जी हम तर गए 

दिख रही सम्भावना को सिर्फ साझा कर रहें 

आखिरी इस शेर में हम रंग थोड़ा भर गए 

लुट रही अस्मत चमन की, कागज़ी घोड़े यहाँ,
और फिर हाले-वतन भी, बद से बदतर कर गए |

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