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आशा का लाभ (लघुकथा)

बर्न वार्ड के बाहर भैंसे  पर सवार यमराज खड़े थे 

" प्रभु क्या सोच रहे हैं ? जल्दी प्राण हरिये और चलिए I आप तो मेरे ऊपर सवार घंटे भर से उस स्त्री को देखे जा रहे हैं,मेरी पीठ की दशा का भी कुछ ध्यान है ?"

"इस पुरुष ने अपनी पत्नी को जलाने का प्रयास किया और स्वयं जल गया I और ये स्त्री ,अपने सारे गहने बेच कर इसका इलाज करवा रही है, देखो कैसे बदहवास बाहर खड़ी रोये जा रही है Iमैं सोच रहा हूँ पुत्र ..............."

"कि इसके प्राण छोड़ दूं .,यही ना प्रभु ?और ये पुरुष ठीक होकर फिर से पत्नी को प्रताड़ित करे "

"ये भी तो हो सकता है कि सुधर जाये Iक्यों न इसको दे ही दिया जाय?"   

"क्या प्रभु ? बेनिफिट ऑफ़ डाउट ?"

"नहीं पुत्र, बेनिफिट ऑफ़ होप "

.

मौलिक व् अप्रकाशित

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Comment by Omprakash Kshatriya on August 14, 2015 at 7:23am

!! वाह !! लघुकथा जोरदार बनी है. बधाई आप को.

Comment by pratibha pande on July 29, 2015 at 9:49pm

आ० कांता रॉय जी , इस प्रयास की सराहना के लिए आपकी ह्रदय से आभारी हूँ 

Comment by pratibha pande on July 29, 2015 at 9:48pm

आ० विनय कुमार जी ,ये होप ही है ,जो संसार को चला रही है , प्रयास की सराहना के लिए आपका आभार 

Comment by kanta roy on July 29, 2015 at 5:44pm
वाह!!!!! पढते ही दिल कह उठा .... बहुत ही उम्दा रचना हुई है यह. सच ही है आशा की एक किरण.... बधाई स्वीकार करें इस सार्थक रचना के लिये.
Comment by विनय कुमार on July 29, 2015 at 3:34pm

// बेनिफिट ऑफ़ होप // , बहुत उम्दा | सम्भावना तो हमेशा बरक़रार रहती है सुधार की और ये पत्नियां देख भी लेती हैं | बहुत बढ़िया लघुकथा , बधाई आदरणीया.

Comment by pratibha pande on July 29, 2015 at 2:05pm

इतने खूबसूरत शब्दों में की गई आपकी टिपण्णी के लिए आपका आभार आ० हर्ष महाजन जी 

Comment by pratibha pande on July 29, 2015 at 2:03pm

कथा की सराहना के लिए आपका आभार आ० वीरेन्द्र वीर जी 

Comment by pratibha pande on July 29, 2015 at 2:01pm

सही कहा  आपने आ० प्रशांत जी कि महिलाऐं दया की मूर्ती होती हैं  और शायद इसी कारण पुरुष मनमानी को अपना जन्म सिद्ध अधिकार मान लेते हैं , कथा की सराहना के लिए आपका  ह्रदय से आभारI 

Comment by Harash Mahajan on July 29, 2015 at 12:40pm

 pratibha pande जी ...अद्भुत अहसास लिए आपकी सोच ..!! सच में ऐसा भी तो होता ही होगा....!! यहाँ कर्मों का खेल भी तो है !! हो सकता है उस मोहतरमा के अच्छे कर्म उस शख्स को जीवन दान दिला गया !! मगर ये निर्भर करता है उस स्त्री के सच्चे प्यार पर | प्रतिभा जी ढेरों दाद वसूल पाइयेगा ||

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on July 28, 2015 at 10:58pm
आदः रचना में दिखाये तथ्य काल्पनिक सही लेकिन उसके माध्यम से स्त्री की अपने जीवन साथी के प्रति कैसी मानसिकता होती है इस को सफलता के साथ दिखाया गया है। इस सफल रचना के लिये सादर बधाई।

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