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बह्र : हुस्न का दरिया जब आया पेशानी पर

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २

 

हुस्न का दरिया जब आया पेशानी पर

सीख लिया हमने भी चलना पानी पर

 

राह यही जाती रूहानी मंजिल तक

दुनिया क्यूँ रुक जाती है जिस्मानी पर

 

नहीं रुकेगा निर्मोही, मालूम उसे

फिर भी दीपक रखती बहते पानी पर

 

दुनिया तो शैतान इन्हें भी कहती है

सोच रहा हूँ बच्चों की शैतानी पर

 

जब देखो तब अपनी उम्र लगा देती

गुस्सा आता है माँ की मनमानी पर

----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:04pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय राणा भाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on July 8, 2015 at 6:27pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भैया वाह .वैसे हर शेर अच्छा हुआ है पर मतला और अंतिम शेर कमाल के है|

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:42am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 8, 2015 at 11:28am

राह यही जाती रूहानी मंजिल तक

दुनिया क्यूँ रुक जाती है जिस्मानी पर

दुनिया तो शैतान इन्हें भी कहती है

सोच रहा हूँ बच्चों की शैतानी पर

जब देखो तब अपनी उम्र लगा देती

गुस्सा आता है माँ की मनमानी पर    --- क्या बात कही , वाह ! आदरणीय , लाजवाब गज़ल के इन बेमिसाल शे र के लिये बधाए आपको ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:16am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय जान गोरखपुरी साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:16am

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय राहुल जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:15am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विनय कुमार जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:14am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय मोहन सेठी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:14am

शुक्रिया आदरणीया परी जी

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 8, 2015 at 10:30am

जब देखो तब अपनी उम्र लगा देती

गुस्सा आता है माँ की मनमानी पर

 बेहतरीन ! बधाई आदरणीय !

कृपया ध्यान दे...

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